सोमवार, 30 मई 2011

संजय दानी की ग़ज़ल - हिज्र की फाइलें, मेरे टेबल पे हरदम रहे।

 
रात की तंग गलियों में सपने मेरे गुम रहे,
उनकी यादों के बेदर्द तूफ़ां भी मद्धम रहे।

नींद आती नहीं ,रात भर जागता रहता हूं,
मेरी तन्हाई के हौसले भी अभी कम रहे।

ज़ख़्मों का बोझ लेकर खड़ा हूं दरे -हुस्न पर,
दर्द ,ग़म, आंसू,रुसवाई इस दिल के मरहम रहे।

हुस्न की आंधियां यूं चलीं शौक़ के गांवों में,
इश्क़ के खेतों पर मुश्किलों के तबस्सुम रहे।

वस्ल का चांद परदेश में बैठकें ले रहा,
हिज्र की फाइलें ,मेरे टेबल पे हरदम रहे।

प्यार की आग की लपटों से कौन बच पाया है,
दिल के मैदानों से दूर बारिश के मौसम रहे।

चांदनी मुझसे नाराज़ थी जब तलक दोस्तों,
तब तलक मेरे घर जुगनुओं के तरन्नुम रहे।

गोया हर दौर में सैकड़ों लैला मजनू हुवे,
दुनिया वाले भी हर दौर में लेक, ज़ालिम रहे। ( लेक--लेकिन)

ईदी का फ़र्ज़ अब हुस्न वाले निभाते नहीं,
इसलिये आशिकों की गली में मुहर्रम रहे।,

गो हवस ज़िन्दगी के मकानों की बुनियाद है,
पर छतों पर सदा सब्र के दानी परचम रहे।

3 blogger-facebook:

  1. ज़ख़्मों का बोझ लेकर खड़ा हूं दरे -हुस्न पर,दर्द ,
    ग़म, आंसू,रुसवाई इस दिल के मरहम रहे।
    वाह बेहतरीन शब्दांकन , बधाई भी शुभकामनायें भी

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह वाह ईदी की बात तो बहुत खूब लगी.

    उत्तर देंहटाएं
  3. कुरवंश जी और भारतीय नागरिक के लमंबरदार को बहुत बहुत धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं

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