संजय दानी की ताज़ा ग़ज़ल - तेरी जुदाई का ऐसा मातम रहा, ताजिन्दगी दूर मुझसे हर ग़म रहा...

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संजय दानी sanjay dani
तेरी जुदाई का ऐसा मातम रहा,
ता-ज़िन्दगी दूर मुझसे हर गम रहा।

मंज़िल मेरी तेरी ज़ुल्फ़ों के गांव में,
दिल के सफ़र में बहुत पेचो-ख़म रहा।( पेचो_ख़म- उलझन)

इक धूप का टुकड़ा था मेरी जेब में,
पर वो भी नाराज़ मुझसे हरदम रहा।

सांसे गुज़र तो रही हैं बिन तेरे भी,
पर जीने का हौसला हमदम कम रहा।

ईमां की खेती करें तो कैसे करें,
बाज़ारे दुनिया में सच भी बरहम रहा। (बरहम- अप्रसन्न)

दिल की गली को दुआ तेरे अब्र की,
ता उम्र ज़ुल्मो-सितम का मौसम रहा।

नेक़ी की दस्तार ढीली ढीली रही, ( दस्तार_पगड़ी)
मीनार छूता बदी का परचम रहा।( परचम- झंडा)

भौतिकता के अर्श में हम ऐसे फंसे, ( अर्श- आकाश)
सदियां गई आदमी पर ,आदम रहा।

बुलबुल-ए-दिल, हुस्न के बगिया में फ़ंसी,
सैयाद से रिश्ता दानी कायम रहा।
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2 टिप्पणियाँ "संजय दानी की ताज़ा ग़ज़ल - तेरी जुदाई का ऐसा मातम रहा, ताजिन्दगी दूर मुझसे हर ग़म रहा..."

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