रविवार, 8 मई 2011

एस. के. पाण्डेय का व्यंग्य - नेता की तरक्की

मँहगाई डाइन की तस्वीर अधिकांश लोगों ने समाचारपत्रों में देखा होगा। तस्वीर देखा हो अथवा नहीं, अधिकांश लोग इसके प्रकोप का अनुभव कर चुके हैं और कर भी रहे हैं। यह ऐसी डाइन होती है जो सबसे ज्यादा गरीबों, किसानों और मजदूरों का ही शिकार करती है। बड़े लोगों, खासकर नेता की ओर यह देखती ही नहीं । ऐसी स्थिति में यह चाहें जितना तांडव मचाये बड़े लोग चैन से सोते रहते हैं। वहीं दूसरी ओर छोटे लोगों के रातों की नींद तक हराम हो जाती है। एक तरीके से कोहराम मच जाता है। गुरुदेव ने कहा है-“तरु छाया सुख जानै सोई। जो अति आतप व्याकुल होई”। ऐसे में एसी में रहने व चलने वाले क्या जानें कि आतप क्या होता है? उनके लिए तरु छाया का क्या मोल है? इसका मोल तो धूप में तपने वाला किसान अथवा मजुदूर ही जान सकता है। ठीक इसी तरह मँहगाई के ताप से झुलसने वाले ही जानते हैं कि मँहगाई क्या है? बहुतों को तो पता तक नहीं चलता।

नेताजी ने जब सुना कि लोग कह रहे हैं कि मँहगाई आसमान छू रही है। आम लोग त्रस्त हैं। तो नेताजी ने अपने पर्सनल एडवाइजर (पीए) से पूछा कि आखिर ये आम लोग कौन हैं? और ये लोग क्यों त्रस्त हैं? सुना है कि कहीं-कहीं विरोध प्रदर्शन भी हुए हैं। पीए बोला आप काहे को टेंसन ले रहे हैं। इसमें आपके विरोधियों की मिली भगत है। आपकी तरक्की हजम नहीं कर पा रहे हैं।

नेताजी ने कहा कि हमारी तथा हमारे भाई लोग की तरक्की पर विरोधी हल्ला-गुल्ला करते हैं तो बात समझ में आती है। क्योंकि तरक्की का अवसर उनके हाथ में नहीं होता। लेकिन भूल जाते हैं कि उन्हें भी यह अवसर मिला था और उन्होंने भी यथा-शक्ति तरक्की किया था। और आज नहीं तो कल फिर अवसर मिलेगा ही। मगर सोचते हैं कि कहीं ऐसा न हो कि जब तक हमें चांस मिले तब तक तरक्की करने के लिए ज्यादा कुछ बचे ही न। लेकिन कौन समझाये कि ऐसा कभी नहीं होगा क्योंकि अपना भारत देश महान है। कितने ही लोग बाहर से आये और गए। सबने अपनी तरक्की की। फिर भी भारत आज भी वैसे ही है। और हम सब तो भारत की सन्तान हैं तो हमें भी महान बनने का पूरा अधिकार है तथा महानता की कोई सीमा नहीं होती।

पीए बोला आपने सच कहा कि भारत महान है। कितने ही विदेशी लोग भी इससे तरक्की कर चुके हैं। फर्क इतना है कि जिन लोगों को लाभ नहीं मिलता था वे उनकी तरक्की को लूट कहते थे। कहते थे कि विदेशी देश को लूट कर अपने देश ले जाते हैं। और आज ऐसे लोग हमारी तरक्की को घोटाला कहते हैं। आलोचना तो सबकी होती है। लोग भगवान तक की आलोचना करते हैं। खैर आज आपके पास क्या नहीं है? मान है, शान है (भले ही ईमान नहीं है)। नाम है , दाम है घर में भी और बाहर भी मतलब देश में भी और बिदेश में भी। क्या तरक्की की है? कहाँ से कहाँ तक की यात्रा तय की है? ऐसी तरक्की महानता है। तथा अभी आप और महान बनेंगे। क्योंकि भारत महान है।

पीए आगे बोला कि रही आम आदमी के त्रस्त होने की बात तो इसमें आपका कोई दोष नहीं है। क्योंकि आम आदमी जन्म से ही त्रस्त होता है। ये वे लोग हैं जो जीवन भर त्रस्त रहते हैं और त्रस्त रहते-रहते ही मर जाते हैं । इतना ही नहीं आम आदमी के बाप-दादा भी त्रस्त थे। और उनके समय में आप नहीं आपके पिता नेता थे। उन्होंने भी इनके बारे में कभी नहीं सोचा था। न ही समझे थे कि ये कौन हैं और क्यों त्रस्त हैं?

दरअसल इन लोगों के बारे में सोचना ही नहीं चाहिये। क्योंकि इनकी बीमारी वंशानुगत और लाइलाज है। इनका तन, मन और सोच सब कुंठित है। सिर्फ त्रस्त होने के अलावा ये न कुछ होते हैं और न ही कुछ जानते हैं। आप आसमान छुएं चाहे मँहगाई (वैसे ये दोनों चीजें साथ-साथ होती हैं ) ये त्रस्त होंगे। क्योंकि इन्हें ऊँचाई से नफरत है। इनका धन, मन, खान-पान, रहन-सहन, घर और सोच कुछ भी तो ऊँचा नहीं होता।

आपको ऊँचाई प्रिय है। यह आपका ही प्रताप है कि छोटी सी दिखने वाली प्याज भी आसमान की ऊँचाई छू लेती है। टमाटर, मटर, दाल, चीनी, मतलब खाने-पीने की सब चीजें ऊँची हो जाती हैं। डीजल और पेट्रोल भी नई ऊँचाई को प्राप्त हुए हैं तथा आपकी कृपा से सभी चीजें अभी और ऊँचाई को प्राप्त होंगी। ऐसे में जिसे ऊँचाई से नफरत है, वह त्रस्त नहीं तो और क्या होगा?

अतः आप और आपके सहयोगी यथावत तरक्की करते रहें। आपकी तरक्की और महानता दिन दूनी और रात चौगुनी बढ़ती ही जाएगी। बशर्ते आप यह न जानें कि यह आम आदमी कौन है? और क्यों त्रस्त है?

सच है जिस दिन देश के नेता यह समझ जायेंगे, उस दिन से नेता की नहीं बल्कि आम आदमी की तरक्की के द्वार खुल जायेंगे।

देश का धन पहले भी विदेश जाता था और आज भी विदेश में ही जमा होता है। रास्ते और तरीके तथा लोग बदल गए हैं। लेकिन मंजिल तो एक ही है-तरक्की।

------------

डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.)।

https://sites.google.com/site/skpandeysriramkthavali/

*********

2 blogger-facebook:

  1. ...और आज ऐसे लोग हमारी तरक्की को घोटाला कहते हैं
    हा हा हा

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------