बुधवार, 4 मई 2011

मिलन चौरसिया की कविताएँ

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बात बने

चश्‍मा लगाने से क्‍या फायदा यारों,

चीजें गर साफ दिख जायें तो कोई बात बने।

 

लाख फिराओ कागज पे तुम बन्‍द कलम,

स्‍याहीशुदा खुले कलम तो कोई बात बने।

 

औरों के गम में तो बहुत हँसते रहे मिलन,

अपने गम में मुस्‍कराओ तो कोई बात बने।

 

इत्र में डूब कर तो कुछ भी महक सकता है,

बगैर इत्र के महक जाओ तो कोई बात बने।

 

अब चाँद तक जाना तो नामुमकिन नहीं,

चांद खुद चल के यहाँ आये तो कोई बात बने।

 

लगाना आग तो बहुतों को सिखलाया तुमने,

सिखा दो आग बुझाना तो कोई बात बने।

 

कौमों मजहबों के बीच अब दीवार की तामीर न करो,

गिरा सको इन दीवारों को तो कोई बात बने।

 

 

समझ नहीं सके

हम इतने ना समझ थे कि समझ नहीं सके।

अपने ही दिल की बात उनसे कह नहीं सके॥

 

सब कुछ समझ कर भी वो अनजान बन गये,

पूछा कभी कि समझा, तो नादान बन गये,

आँखों में अश्‍क भर गये पर बह नहीं सके।

अपने ही दिल की बात उनसे कह नहीं सके॥

 

हम इतने ना समझ थे..... ......... .................।

अपने ही दिल की बात .................................॥

सोचा था हाल- ए-दिल उन्‍हें बयान करेंगे,

छूटे ना कोई बात, सब बखान करेंगे,

वो जब सामने आये तो कुछ भी कह नहीं सके।

 

अपने ही दिल की बात ....................................॥

हम इतने ना समझ थे........................................।

अपने ही दिल की बात.......................................॥

हम चाहते हैं कितना उन्‍हें, कौन बताये,

दीवाने दिल का हाल उन्‍हें, कौन बताये,

उनकी जुदाई दिल हमारा सह नहीं सके।

अपने ही दिल की बात ...................................॥

हम इतने ना समझ थे ......................................॥

अपने ही दिल की बात......................................॥

नैन मिले

मेरे दिलवर को सकूँ मिले, मुझे चैन मिले ।

खुदा करे हो ऐसा जब उनसे नैन मिले ॥

 

उनके दिल में मेरी मोहब्‍बत का फूल खिल जाये,

जो वाजिब हो तो मेरा प्‍यार मुझे मिल जाये,

मुझे मिले ना मिले उनके दिल को चैन मिले।

खुदा करे.........................................................॥

 

वो दिल मेरा चाहे, जितना जला लें,

मैंने दिल किया अपना, उनके हवाले,

उन्‍हें मिले उनकी चाहत,तो भी मुझे चैन मिले।

खुदा करे ........................................................॥

 

सूरज चांद सितारे सब उनके हों अपने,

पूरे सब हो जायें जो उनके हों सपने,

गिला नहीं भले ही गम की मुझे रैन मिले।

खुदा करे....................................................॥

 

अब सोचता हूं रात भर

मैं सोचता था बात एक, करवट बदलने तक।

अब सोचता हूं रात भर सूरज निकलने तक॥

 

दो बात कोई ना करे अब अपनों से,

गैरों को देते आसरा उसको सम्‍हलने तक॥

 

निकाल देते हैं क्‍यों लोग घर से बुढ़ापे को,

सम्‍हाले रहते हैं वो आइना जबकि चटकने तक॥

 

लगाकर आग वो घरों को अब होते हैं खुश,

खड़े रहते थे जो एक पांव पर मौसम बदलने तक॥

 

ये सिलसिला तब तक खत्‍म होगा नहीं मिलन,

सिमटती रहेगी जहाँ में मुहब्‍बत जब तलक॥

--

 

मिलन चौरसिया

कवि परिचय

नाम-मिलन कुमार चौरसिया

उपनाम-सिपाही

ग्राम-मुहम्‍मदाबाद सिपाह

थाना-दोहरीघाट

जनपद-मऊ। उ0प्र0 भारत।

email: mkc6566@yahoo.com

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