शनिवार, 14 मई 2011

पुस्तक समीक्षा : युवा और प्रतिष्ठित अब तक छप्‍पन

image

अब तक छप्‍पन

लेखकः यशवन्‍त व्‍यास

प्रकाशकः भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्‍ली

मूल्‍यः 190 रु․

पृप्‍ठः 252

युवा और प्रतिष्ठित अब तक छप्‍पन

व्‍यंग्‍यकार यशवन्‍त व्‍यास के नये पुराने छप्‍पन व्‍यंग्‍यों का यह संकलन पढ़कर लगा कि व्‍यंग्‍य की सार्थकता निरन्‍तर प्रमाणित हो रही है। सम्‍पादन, पत्रकारिता, इन्‍टरनेट एवं साहित्‍य की गहरी समझ के कारण ये व्‍यंग्‍य-रचनाएँ अन्‍दर तक प्रभावित करती है। इस संग्रह से पूर्व यशवन्‍त व्‍यास की ‘जो सहमत हैं सुनें' तथा व्‍यंग्‍य उपन्‍यास ‘चिन्‍ताधार' भी पढ़ा था। उस पुस्‍तक में ‘जो सहमत है सुनें' की भी कुछ रचनाएँ संकलित हैं।

वास्‍तव में व्‍यंग्‍य की रचना प्रक्रिया के दौरान अकसर लेखक अपने आसपास की घटनाओं, पात्रों, चरित्रों आदि को आधार बनाकर रचना का ताना-बाना बुनता है, जो व्‍यंग्‍यकार को एक तीखी नज़र देता है।

‘अब तक छप्‍पन' में संकलित रचनाएं यह प्रमाणित करती है कि जो घृणास्‍पद है, उसे छोड़ना चाहिए और जो अनुकरणीय है उस तक पहुँचना चाहिए। विसंगतियों, विद्रूपताओं और यथार्थ के धरातल पर रचना को तोला जाना चाहिए।

यशवन्‍त व्‍यास का लेखन समकारिता का आईना है। वे कथन में कहते है-

गम्‍भीर होकर भी मैं कुछ खतरे उठा सकूँ-तो यह मेरे लिए प्रिय सपना होगा। इसलिए कल्‍पना की दुनिया का कोई भी पक्‍का ब्‍ल्‍यू प्रिंट मैं आपको नहीं दे सकता।

इस पुस्‍तक में साहित्‍यिक व्‍यंग्‍य भी काफी है। बची हुई जगह राजनीति ने घेर ली है। एक गोष्ठी ः तीन दीवानें, हरे साँप की कविता लेखन में ईसबगोल, जाने किस किस पुरस्‍कार से सम्‍मानित साहित्‍यकार से बातचीत, कवि ः चार अंकीय त्रासदी आदि साहित्‍यिक व्‍यंग्‍य है। विकास का शौचालय सिद्धान्‍त देश के तथाकथित विकास की पोलखोलता है। खण्‍ड-खण्‍ड विकास का पाखण्‍ड पर्व यशवन्‍त व्‍यास को हर समय बेचैन किये रहता है।

प्रेमचन्‍द से गलती हुई नामक लेख ‘जो सहमत हैं, सुनें, में लेखक विशेष के जाति विशेष में जन्‍म के फायदे के नाम से संकलित है। विनम्रता का मौसम इस पुस्‍तक का श्रेष्ठ व्‍यंग्‍य है। करप्‍शन कर कविता में ढाल भी पठनीय है। यश्‍वन्‍त व्‍यास फिल्‍मों पर भी काफी लिखते हैं और इसी कारण उनकी रचनाओं में फिल्‍म, युद्ध,प्‍यार, बलात्‍कार, शर्म, भावना, घृणा, प्रतिबद्धता आदि महसूस किये जा सकते हैं।

यशवन्‍त व्‍यास का लेखन समकालिन व्‍यंग्‍यकारों से अलग है। अनोखा है और अलग से स्‍वीकृति की माँग करता है। यह नाम अन्‍य नामों से अलग से रेखांकित होना चाहता है और यही लेखक की विशेपता भी है और कमजोरी भी। वे कथात्‍मकता के ताने-बाने के साथ रचना शुरु करते हैं कभी-कभी स्खलित होकर शुद्ध लेख की तरह रचना को आगे बढ़ाते है और अन्‍त में शिल्‍प की विविधता के सहारे रचना को एक पूर्णता देने का सार्थक प्रयास करते है। अधिकांश रचनाएँ कथा की श्रेणी में आती है, व्‍यंग्‍य-लेख की श्रेणी में नहीं। लेकिन इन रचनाओं में व्‍यंग्‍य है, तीखा पैनापन है और इसी कारण व्‍यास जी एक व्‍यंग्‍यकार की ताब रखते है।

इन रचनाओं को पढ़ने के बाद यह आशा की जा सकती है कि वे छप्‍पन सौ रचनाएँ देंगे, जैसा उन्‍होंने वादा किया है। लेकिन यशवन्‍त व्‍यास को एक वृहद व्‍यंग्‍य उपन्‍यास लिखने की जिम्‍मेदारी लेना चाहिए ताकि ‘राग दरबारी' से आगे जा सकें।

पुस्‍तक का गैटअप व प्रोडक्‍शन अच्‍छा है।

--

 

समीक्षक - यशवंत कोठारी

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------