बुधवार, 11 मई 2011

मालिनी गौतम की कविता - मन

मन

लो फिर उठने लगे

मन में विचार

न जाने इसे

क्या हो जाता बार-बार

हर पल करता रहता

मुझ पर प्रहार।

 

अभी कुछ देर पहले

उलझा हुआ था

अपने नंग-धड़ंग भाई को

बगल में उठाए हुए

कचरा बीनती लड़की में,

तो अब हो रहा है परेशान

एक गोरैया के

बार-बार कमरे में आने-जाने पर

 

कल व्यस्त था

किसी पागल के

अनर्गल एकालाप को सुनने में

तो कभी हो जाता है व्यथित

ऊँची अट्टालिकाओं के बाहर

फुटपाथ पर सोते बच्चों को देखकर।

 

क्या करूँ ?कैसे करूँ?

क्या कर नहीं सकती मैं बंद

मन का प्रवेश द्वार ?

कितनी ही बार

इन्हें धकियाती हूँ,

खदेड़ती हूँ

छोड़ आती हूँ

भोग-विलास,आमोद-प्रमोद

व खुशियों से रेलमछेल

भूल-भुलैयाओं में।

 

कितनी ही बार

इन्हें चुनवा देती हूँ

ईंट और गारे की दीवारों में

ऊपर उगा देती हूँ

हरी मखमली लॉन/गुलाब के फूल।

 

पर हर बार ये

धुँआ बन, हवा में घुलकर

निकल आते है बाहर

चोरी-छुपे रेंग-रेंगकर

प्रवेश करने लगते हैं मेरे मन में

और जकड़ लेते हैं मुझे

अपनी ऑक्टोपसी भुजाओं में

धीरे-धीरे होते जाते हैं

परछाईंयों की तरह

बड़े/लम्बे/विशाल

और ढंक लेते हैं

मेरे वजूद को फिर एक बार........

 

डॉ.मालिनी गौतम

5 blogger-facebook:

  1. बेहतरीन कविता बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत दिन बाद आज आपकी एक और बेहतरीन रचना पढ़ने को मिली

    ईंट-गारे में चिनवाकर
    हो गया है मन
    अनारकली सा अमर
    जिस दिन थक जाएगा मन
    थम जाएगा उसका
    उलझना....
    और सुलझना भी
    इसलिए देखती रहिये कचरा बीनती
    लड़की को
    और गौरैया को भी

    उत्तर देंहटाएं
  3. धीरे-धीरे होते जाते हैं

    परछाईंयों की तरह

    बड़े/लम्बे/विशाल

    और ढंक लेते हैं

    मेरे वजूद को फिर एक बार........

    bahoot khoob...

    उत्तर देंहटाएं
  4. यद्यपि मन की चंललता पर आपकी रचना का केन्द्रीय भाव है फिर भी इसमें जो भावाभिव्यक्ति हुई है उससे सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा राजनैतिक क्षेत्र में व्याप्त विरोधाभास रेखांकित हुए हैं। यह इस रचना की सार्थकता है। पाठक के चिंतन को झकझोरने के लिए साधुवाद!
    ==============================================
    सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी

    उत्तर देंहटाएं
  5. मन होता ही है चंचल,
    कर लेता है हमें आपने वश में.
    भागता रहता है इधर-उधर,
    नहीं आता कभी मेरे बस में.

    आकाश नहीं है इसकी सीमा,
    पाताल को भी खोद के कही चला जाता है.
    भीड़ में तनहा कर देता है कभी,
    कभी तन्हाई में भी मेला लगा जाता है.

    जो नहीं बनाया भगवान ने,
    कभी उसे भी खयालो में ले आता है.
    कभी जो अस्तित्व में है,
    उसे भी नकार के चले जाता है.

    मन हमारे पास नहीं होता,
    हम मन के पास होते है.
    इस्कबस चले तो जागते है,
    इसके बस पर ही सोते है.
    *GKS

    उत्तर देंहटाएं

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