बुधवार, 4 मई 2011

एस. के. पाण्डेय की बाल कविता - कबूतर और तीतर

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बच्चों के लिए: कबूतर और तीतर

(१)

कभी धरा कभी धरा के ऊपर ।

रहता-उड़ता एक कबूतर ।।

घर था उसका पेड़ के ऊपर ।

जिस पर रहता था एक तीतर ।।

(२)

दोनों सुंदर दोस्त निराले ।

एक-दूजे के थे रखवाले ।।

पास नदी में रोज नहाते ।

इधर-उधर से चारा लाते ।।

(३)

दोस्ती दोनों खूब निभाते ।

साथ-साथ थे आते-जाते ।।

तरह-तरह की दोनों बातें ।

करते रहते नहीं अघाते ।।

(४)

उड़ते-उड़ते जब थक जाते ।

एक-दूजे को वो सहलाते ।।

खाते, पीते, सोते, गाते ।

खुश होकर दिन-रात बिताते ।।

(५)

एक दिन एक बहेलिया आया ।

चुपके-चुपके तीर चलाया ।।

लगा कबूतर को चिल्लाया ।

तीतर भी अतिशय घबराया ।।

(६)

बोला भैया खाते गोस्त ।

इससे मारा मेरा दोस्त ।।

जीना अब मेरा बेकार ।

मुझको भी तुम डालो मार ।।

(७)

पशु-पक्षी को खाते मार ।

अपनों से तुम करते प्यार ।।

कोई जो दे इनको मार ।

दुःख न होगा करो बिचार ।।

(८)

बढ़ता गया उसका संताप ।

मर गया तीतर अपने आप ।।

जीव हत्या से होता पाप ।

दुःख में देते होंगे शाप ।।

अपने बच्चों के माँ-बाप ।

होते ये भी छोड़ो पाप ।।

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डॉ एस के पाण्डेय,

समशापुर, उ. प्र. ।

http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/

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  1. बहुत ही करूणामय अभिव्यक्ति!!

    अनंत आभार, पाण्डेय जी!!

    इस सार्थक व कोमल सम्वेदना की प्रस्तुति के लिये रवि जी आपका भी आभार!!

    _________________________

    सुज्ञ: जीवन का लक्ष्य

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