बुधवार, 1 जून 2011

कहानी संग्रह - 21 वीं सदी की चुनिन्दा दहेज कथाएँ - (16) बेटे की खुशी

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कहानी संग्रह

21 वीं सदी की चुनिन्दा दहेज कथाएँ

संपादक - डॉ. दिनेश पाठक 'शशि'

अनुक्रमणिका

1 -एक नई शुरूआत - डॉ0 सरला अग्रवाल
2 -बबली तुम कहाँ हो -- डॉ0 अलका पाठक
3 -वैधव्‍य नहीं बिकेगा -- पं0 उमाशंकर दीक्षित
4 - बरखा की विदाई -- डॉ0 कमल कपूर
5- सांसों का तार -- डॉ0 उषा यादव
6- अंतहीन घाटियों से दूर -- डॉ0 सतीश दुबे
7 -आप ऐसे नहीं हो -- श्रीमती मालती बसंत
8 -बिना दुल्‍हन लौटी बारात -- श्री सन्‍तोष कुमार सिंह
9 -शुभकामनाओं का महल -- डॉ0 उर्मिकृष्‍ण
10- भैयाजी का आदर्श -- श्री महेश सक्‍सेना
11- निरर्थक -- श्रीमती गिरिजा कुलश्रेष्‍ठ
12- अभिमन्‍यु की हत्‍या -- श्री कालीचरण प्रेमी
13- संकल्‍प -- श्रीमती मीरा शलभ
14- दूसरा पहलू -- श्रीमती पुष्‍पा रघु
15- वो जल रही थी -- श्री अनिल सक्‍सेना चौधरी
16- बेटे की खुशी -- डॉ0 राजेन्‍द्र परदेशी
17 - प्रश्‍न से परे -- श्री विलास विहारी

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(16) बेटे की खुशी

राजेन्‍द्र परदेशी

शकुन्‍तला की शादी में दशरथ मिसिर को बहुत कुछ झेलना पड़ा था। वह सब कुछ भूल गये थे। याद रह गये थे तो सिर्फ बीस हजार रुपये, जो उन्‍होंने दहेज में दिये थे। वे इस आशा में थे कि पोते की शादी में दहेज लेंगे ही, शादी भी धूम-धाम से करेंगे। एक ही तो पोता है। रामपुर से हरिभजन तिवारी अपनी लड़की की शादी के लिए जब उनसे मिलने आये तो बात करने को कौन कहे, दशरथ मिसिर ने शादी की चर्चा करने से इनकार कर दिया। उन्‍हें पता था कि हरिभजन तिवारी की आर्थिक स्‍थिति वैसे ही खराब है, शादी में खर्च ही क्‍या करेंगे।

लेकिन उनका सोचा हुआ सब उल्‍टा हो गया। उन्‍होंने सुना कि उनके बेटे कैलाश ने हरिभजन तिवारी के यहाँ प्रकाश की शादी तक कर डाली, वह भी बिना दहेज के। उनको कैलाश पर बहुत क्रोध आया। उसने तो सारा सपना ही बरबाद कर दिया था। दशरथ मिसिर का कहना था कि जो जितना ज्‍यादा दहेज पाता है, वह उतना ही बड़ा आदमी होता है कैलाश के फैसले से उनकी योजना धरी की धरी रह गयी। उन्‍होंने पत्‍नी को आवाज दी-‘‘कैलाश की माँ ओ कैलाश की माँ।''

‘‘क्‍या है, जो इतनी जोर से बोल रहे हो?''

‘‘कैलाश का दिमाग तो नहीं खराब हो गया है।''

दशरथ मिसिर की पत्‍नी रमादेवी यह जानती थीं कि मिसिर यह सब क्‍यों कह रहे हैं। फिर भी अनजान बनते हुए बोलीं-‘‘क्‍यों, क्‍या हुआ?''

‘‘उसने रामपुर के तिवारी हरिभजन के यहाँ प्रकाश की शादी तय कर ली।'' क्रोध के कारण दशरथ मिसिर के मुँह से शब्‍द मुश्‍किल से निकल रहे थे। ‘‘वह भी बिना दहेज के।''

रमादेवी जानती थीं कि कैलाश ने जो निर्णय ले लिया है, उसमें वह कोई भी परिवर्तन नहीं करेगा। उससे कुछ कहना बेकार है। अच्‍छा होगा, अपने पति को ही समझाया जाय, जिससे परिवार में टकराव की स्‍थिति पैदा न हो। वे बोलीं-‘‘उसका लड़का है। वह जहाँ चाहे, उसकी शादी करे। आप क्‍यों इन सब मामलों में पड़ते हैं। आपको तो अब भगवान का भजन करना चाहिए।''

‘‘वह घर में आग लगाये और मैं चुपचाप देखता रहूँ।'' मिसिर ने अपनी खीझ उतारी।

‘‘आग कौन लगा रहा है जो आप इतने परेशान हैं।'' पत्‍नी के विचारों का उनके विचारों से मेल नहीं हुआ। दशरथ मिसिर बोले, ‘‘यह आग लगाना नहीं तो और क्‍या है। मानपुर के गया तिवारी पन्‍द्रह हजार नगद दे रहे थे, नाच-बाजे का अलग से। लेकिन कहा कि बीस हजार नगद से एक पैसा कम नहीं लेंगे।''

पिता और पुत्र के विचारों में काफी विरोधाभास था। रमादेवी इसका अनुभव कर रही थी। समस्‍या का समाधान कहीं दीख नहीं रहा था। पति को झुंझलाकर बोलीं-‘‘आप पोते की शादी तय कर रहे थे कि उसे जानवरों की तरह बेच रहे थे?''

मिसिर को गुस्‍सा आया। वे बोले, ‘‘तुम्‍हारा भी दिमाग तो नहीं खराब हो गया है?''

‘‘क्‍यों?''

‘‘ऐसी बातें जो कर रही हो।''

रमादेवी को दहेज से कुछ लेना-देना नहीं था। वह तो मात्र यही चाहती थीं कि परिवार में कलह न हो। कैलाश के बेटे की शादी में वे दहेज लेने के पक्ष में नहीं थीं। परन्‍तु दशरथ मिसिर बिना दहेज की शादी की बात सोच भी नहीं सकते थे। रमादेवी को खीझ आना स्‍वाभाविक था। पति पर अधिकार जताते हुए बोली, ‘‘अभी उस दिन दूसरों को क्‍यों कोस रहे थे जहाँ भी जाओ, लोग दहेज के बिना बात नहीं करते।''

‘‘तो किसी भिखमंगे के यहाँ शादी कर लूं?''

‘‘इतनी अच्‍छी लड़की दे रहे हैं, और क्‍या दें?''

‘‘यह तो सभी करते हैं। दहेज नहीं लेगें तो शादी में खर्चा-वर्चा कहाँ से होगा?

नाच-बाजा, धूम-धाम करनी होती है वह सब कैसे होगा?''

रमादेवी ने अनुभव किया कि दशरथ मिसिर अपने सामने किसी की न सुनेंगे। इससे अच्‍छा है कि यहाँ से हट लिया जाय। यही सोचकर काम का बहाना बनाकर वे चली गयीं।

माँ और पिता के बींच चल रही वार्ता कैलाश ने सुन ली थी। वह बगल के कमरे में लेटा था। माँ को जाते हुए देखकर वह कमरे से बाहर आया और पिता से बोला-‘‘शादी के अवसर पर अनावश्‍यक खर्च करने की क्‍या जरुरत है?''

अचानक कैलाश को सामने पाकर दशरथ मिसिर बोले-‘‘कल तुम यह भी कहोगे कि गहने न बनवाये जायें।''

‘‘यह तो मैंने ही निश्‍चय कर लिया है। वैसे आजकल गहने पहनता ही कौन है?'' कैलाश की बातों से दशरथ मिसिर को उसकी नादानी की झलक मिल रही थी।

बोले-‘‘गांव के लोग क्‍या कहेंगे, उसके बारे में तुमने कभी सोचा है?''

कैलाश बोला-‘‘दूसरों को दिखाने के लिए अपनों को उजाड़ दिया जाए, यह कहाँ की बुद्धिमानी है।''

‘‘अपना कौन?''

‘‘लड़की वाले, और कौन?''

‘‘हमने क्‍या सबका जिम्‍मा ले रक्‍खा है।' कैलाश का दिमाग कुछ गरम हो गया। आवेश में बोला-‘‘वह दिन आप क्‍येां भूल गये, जब शकुन्‍तला की शादी के लिए आपको किस-किस का मुँह देखना पड़ा था। कहाँ-कहाँ नहीं भटकना पड़ा था।''

‘‘इससे क्‍या? हमारी लड़की थी। हमें तो यह करना ही था।'' मिसिर झुंझलाकर बोले-‘‘किसने मेरे साथ रियायत की थी। और तेा और, पुराने रिश्‍तेदारों ने भी ठीक से बात नहीं की थी। अगर बाप-दादा की जमीन न होती तो पता नहीं क्‍या होता?''

कैलाश बोला-‘‘किसी के पास साधन न हों तो वह अपनी लड़की को जीवन भर कुंवारी रक्‍खें।''

पुत्र के तर्क मिसिर के मन को छू नहीं पा रहे थे। परम्‍पराओं से चली आ रही मान्‍यता को कैलाश के द्वारा ध्‍वंस करना उन्‍हें अच्‍छा नहीं लग रहा था। उधर कैलाश भी अपने निर्णय से टस-से-मस होने को तैयार न था। ऐसी स्‍थिति में टकराव स्‍वाभाविक था। कैलाश बोला-‘‘कितने लोग तो इसी कारण कोई सही निर्णय नहीं कर पाते कि लोग क्‍यों कहेंगे।''

दशरथ मिसिर अनुभवी थे। उन्‍होंने कैलाश की बातों से अनुमान लगा लिया था कि वह अपनी बात से एक कदम पीछे नहीं हटेगा। ऐसी स्‍थिति में अच्‍छा यही है कि बेटे की खुशी के लिए अपने मन को ही समय के अनुरूप ढाल दिया जाए। यही सोचकर बोले-‘‘कैलाश! बेटे की शादी है जैसा तू चाहे, कर........हमने भी बेटे की शादी अपने मन से की थी।'' उनके चेहरे पर तनाव नहीं, सहज मुस्‍कान थी।

कैलाश को विश्‍वास नहीं था कि बापू उसके पक्ष में इतनी आसानी से अपना निर्णय दे देंगे । वह खुश था, बेहद खुश था।

'''

बी-1118,

इन्‍दिरानगर,

लखनऊ-226016 (उ.प्र.)

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(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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