गुरुवार, 2 जून 2011

21 वीं सदी की चुनिन्दा दहेज कथाएँ - (18) प्रश्न से परे

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कहानी संग्रह

21 वीं सदी की चुनिन्दा दहेज कथाएँ

संपादक - डॉ. दिनेश पाठक 'शशि'

अनुक्रमणिका

1 -एक नई शुरूआत - डॉ0 सरला अग्रवाल
2 -बबली तुम कहाँ हो -- डॉ0 अलका पाठक
3 -वैधव्‍य नहीं बिकेगा -- पं0 उमाशंकर दीक्षित
4 - बरखा की विदाई -- डॉ0 कमल कपूर
5- सांसों का तार -- डॉ0 उषा यादव
6- अंतहीन घाटियों से दूर -- डॉ0 सतीश दुबे
7 -आप ऐसे नहीं हो -- श्रीमती मालती बसंत
8 -बिना दुल्‍हन लौटी बारात -- श्री सन्‍तोष कुमार सिंह
9 -शुभकामनाओं का महल -- डॉ0 उर्मिकृष्‍ण
10- भैयाजी का आदर्श -- श्री महेश सक्‍सेना
11- निरर्थक -- श्रीमती गिरिजा कुलश्रेष्‍ठ
12- अभिमन्‍यु की हत्‍या -- श्री कालीचरण प्रेमी
13- संकल्‍प -- श्रीमती मीरा शलभ
14- दूसरा पहलू -- श्रीमती पुष्‍पा रघु
15- वो जल रही थी -- श्री अनिल सक्‍सेना चौधरी
16- बेटे की खुशी -- डॉ0 राजेन्‍द्र परदेशी
17 - प्रश्‍न से परे -- श्री विलास विहारी

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(17) प्रश्‍न से परे

विलास विहारी

 

बटेसर को इन दिनों काफी सोच-फिकर हो गई है। उसे बस से ज्‍यादा अपनी बेटी किरमिनियां की चिन्‍ता है। किरमिनियां इस साल सोलह पार कर गई। उसकी शादी अब बिल्‍कुल जरुरी है। असल में उसने पिछले साल ही उसकी शादी करने का फैसला कर लिया था लेकिन वह करे तो क्‍या करे! खेतों में उपज नहीं होती, एक चुटकी भी धान घर में नहीं आता है। थोड़ी-बहुत रब्‍बी भले हो जाती है, लेकिन उससे क्‍या होगा! सालों भर क्‍या सत्तू खा कर कोई जी सकता है। और फिर मुखिया का तगादा! उस का भी तो कुछ न कुछ धारता है बटेसर। रोज-रोज मुन्‍शी आकर उसे धमका जाता है। कहता है, टाका देने का दम नहीं है तो लिखा दो रुक्‍का। तुम्‍हारा कोई नौकर नहीं जो रोज-रोज तगादा करता फिरुं। बटेसर की बचे तो इस मुन्‍शी का गट्‌टा पकड़ कर उसे दो लाठी लगाए कि हिसखे (आदत) छुट जाए दुष्‍ट की। लेकिन बुढ़ारी पर वह क्‍या करे। वह समांग नीं इसलिए सबका सहना पड़ता है। कुछ पुश्‍तैनी जमीन थी तो दोनों शाम भरपेट खाना मिल जाता था। आधी जमीन बप्‍पा कर मरा है। अब अगर वह बाकी जमीन भी बेच दे तो सत्तू भी खाने को नहीं मिल पाएगा। मुखिया की नजर तो इस जमीन पर हरदम रहती है कि सूरभरना जैसे ही लगे, बस जमीन हड़पो। क्‍या खैरात में आई है ऐसी-सोने-सी जमीन, हूँ। मुखिया के मन को खूब जानता है बटेसर। वह भला कभी देगा अपनी जमीन को सूर-भरना में! कभी नहीं, इसीलिए तो जब भी कभी मुखिया सूरभरना की बात बोलता है, बटेसर उसे टरकाता है।

लेकिन यह कब तक चलेगा! कितने दिन और टरकाएगा वह मुखिया को! एक-न-एक दिन तो उसे चुकाना ही पड़ेगा, बप्‍पा का लिया हुआ कर्ज जो धारता है वह!

एक तरह से मुन्‍शी ठीक ही बोलता है, रुक्‍का लिख देने से तगादा तो नहीं होगा। कम से कम दो-तीन साल तक तो मुखिया को कुछ भी बोलने का मौका नहीं मिलेगा न! इसी बींच किरमिनियां की शादी हो जाएगी। निश्‍चिन्‍त हो जाएगा वह। उसकी एकमात्र सन्‍तान किरमिनियां को भी अगर अच्‍छा घर-वर नहीं मिले तो बटेसर की जिन्‍दगी ही बिरथा!

कभी-कभी तो वह सोचता है, जो कुछ भी थोड़ी-बहुत जमीन-जायदाद है.........बाड़ी-झाड़ी, खेत-खलिहान, यह घर-मकान और डगर-बथान, सब लिख दे किरमिनियां के नाम। जमाई को घर जमाई बना। बेटी-जमाई दोनों नजरों के सामने रहेंगे। हम लोगों का क्‍या ठिकाना, कब टन बोल दें! लिे कन बटसे र जानता है ऐसे  जमाइ  निकम्‍मा होता  है घर बठै  खाएगा और मस्‍ती करता फिरेगा! यह उसे पसन्‍द नहीं। फिर किरमिनियां को वह अपने भरोसे ही क्‍यों! वह तो उसे ऐसे घर में देना चाहता है जहाँ वह राज भोगे।

बिसनपुर के बुलाकी चौधरी का पोता उसकी नजर में है। यह रिश्‍ता अगर हो जाय तो किरमिनियां का भाग खुल जाए। लेकिन बुलाकी चौधरी उसके घर में रिश्‍ता करेगा? बीस बीघे नम्‍बर एक धनहर जमीन। पायली भर मारा हो जाए लेकिन उस बिस-बिघिया में कभी भी बीघा पीछे पचीस मन धान से कम न हुआ। दोगाही जमीन है.......एक तरफ पोखर और दूसरी तरफ नद्‌दी। काहे को खेत कभी सूखेगा! तब न, उसके घर में सालों भर चावल मौजूद रहता है और बथान पर गाय-भैंसें जुगाली करती नजर आती हैं। दाय-नौड़ी और नौकर-चाकर बरवक्‍त सेवा-बरदास के लिए लगे रहते हैं। धन भाग! ऐसे सुख सबको भगवान दे! बप्‍पा अगर आज जिन्‍दा रहता तो यह रिश्‍ता हो जाता। उसकी बुलाकी चौधरी से बड़ी यारी थी। बटेसर को तो याद है, बचपन में उसने देखा है.......बुलाकी चौधरी कितनी बार उसके दरवाजे पर आया है। उसने उसे पानी भी पिलाया है। अब तो वह पहचानेगा भी नहीं। बप्‍पा रहता तो यह रिश्‍ता बिना किसी लेन-देन के तय हो जाता, लेकिन बप्‍पा के नाम पर अब कहने से ही क्‍या फायदा! जो कुछ करना होगा अब तो उसे ही करना है। अपने ही भरोसे जीना है!

बटेसर जलखै खा कर बड़ी सोटते हुए आंगन से द्वार पर आया। दो बार डकारते उसने बाएं हाथ से अपना पेट सहलाया और फिर अपने आप भनभनाया. .....साला, सत्तू खाओ तो ऐसे ही डकारें आएंगी, बिलकुल नमकीन-नमकीन।

घी-दूध, चूड़ा-दही और दाल-भात की डकारें अलग होती हैं कितनी बढ़िया! इच्‍छा होती है कि हरदम डकारता ही रहे, लेकिन बढ़िया खान-पान तो अब नसीब नहीं। रोपो धान तो होती है रब्‍बी, तो फिर सालों भर सत्तू नहीं खाओगे तो क्‍या तुम्‍हारे लिए चूड़ा-दही आसमान से बरसेंगे।

उसने बीड़ी में जोर से दम लगाया। बीड़ी फुसफुस बोलती रही तो बटेसर फिर बड़बड़ाया, दुष्‍ट आजकल सभ्‍भे बैमान बन गए हैं। दूसरों का जितना हड़प सको, हड़पो। बीड़ी बनाने वाला तक बिना मसाले की बीड़ी बनाएगा। खाली पत्ता लेपेटा और तागे से बांध दिया..........बस हो गई बीड़ी। चोर कहीं का!

उस ने ताख पर से खोज कर एक अच्‍छी-सी बीड़ी निकाली और पतली बीड़ी की ठूंठ से उसे सुलगाया। जोर से लम्‍बा कश खींचते ही इस बार वह खांसने लगा। पूस में जरा-सी सर्दी क्‍या हुई कि कफ और खांसी ने जैसे जकड़ लिया है। जाने का नाम ही नहीं लेती, इतनी जिद्‌दी है।

उमर भी तो हो गई है अब बटेसर की। बूढ़ा हो चला है। बप्‍पा तो साठ बरस ही जी ले, यही बहुत है। इसी बीच किरमिनियां को ब्‍याहना ही होगा। उसे फिर किरमिनियां का सोच होने लगा। बिना उसे ब्‍याहे भला वह कैसे मरेगा! अच्‍छे घर में बेटी चली जाए तो वह चैन से मर भी सके। इस बार जैसे हो, यह काम करना ही पडे़गा।

किरमिनियां की माँ गरजती हुई बटेसर के पास आ धमकी...........‘‘का हो, पेट भर गया तो आकर निश्‍चिन्‍त हो गए! तुम को तो बेटी की कोई फिकिर नहीं है, कैसे बाप हो! भला जिसके घर में बिन बिहाई जवान बेटी पड़ी है वह इस तरह निफिकिर हो कर बीड़ी सोटेगा!''

‘‘मैं निश्‍चिंत नहीं बैठा हूँ किरमिनियां की माँ। मैं भी अभी यही सब सोच रहा था।''

‘‘तुमको तो सोचते-सोचते सालों बीत गए। अब दिन कहाँ हैं! एक ही लगन तो है। फिर दो सालों तक अतिचार। जाओ, आज ही जाओ, कुछ करो। ऐसे बैठे जाने से कुछ नहीं होगा। कहते थे, बुलाकी चौधरी के पास जाओगे, तो जाओ न आज उसी के घर। पूछ कर देखो तो सही। कहीं जाओगे-आओगे नहीं तो लोग तुम्‍हारे दरवाजे पर जमाई ला कर बांध तो नहीं जाएंगे।''

‘‘किरमिनियां की माँ, कैसे बात करती है तू! बेटी की कितनी फिकिर होती है वह बाप ही जानता है। तुझको क्‍या, घर में बैठी रहती है, आगे-पीछे, अच्‍छा-बुरा तो मुझे ही देखना पड़ता है न! बुलाकी चौधरी इतना बड़ा गृहस्‍थ है, भला वह क्‍यों अपने पोते की शादी मेरे घर करने लगा!''

‘‘तुम तो केवल अपनी ही कहोगे। कुछ करोगे-धरोगे नहीं। बुलाकी चौधरी के घर एक बार जा कर देखो। बप्‍पा का नाम बोलोगे तो मुझे उम्‍मीद है वह मान जाएगा। बेटी का वर खोजते-खोजते लोगों के जूतों के तलवे घिस जाते हैं और तुम इस द्वार पर से उतरने का नाम ही नहीं लेते। मैं किरमिनियां के हाथों तुम्‍हारा कुरता और गमछा भेजती हूँ, चले जाओ चौधरी के यहाँ, संझा तक लौट आना,'' किरमिनियां की माँ बकती हुई चली गई।

किरमिनियां की माँ ठीक ही कहती है, बटेसर फिर विचारने लगा। उस दिन पुरोहित बाबा बोल गए थे, बस एक ही लगन है अब इस बार। फिर दो वर्षों तक अतिचार। एक बार बुलाकी चौधरी के दरवाजे पर वह हो ही आए। कहीं रिश्‍ता हो जाए!

कुरता, मुडे़ठा और गमछा रखकर जब किरमिनियां द्वार की देहरी उतरने लगी तब बटैसर उसे देखता रह गया। उसे लगा जैसे वह अपनी बेटी को बहुत दिनों के बाद देख रहा है। सचमुच कितनी सयानी हो गई है किरमिनियां! आज जिस तरह भी होगा, बटेसर चौधरी से बात पक्‍की करके ही लौटेगा। वह अपना कुरता पहनने लगा। खादी का कुरता देा जगहों से फट चुका था। किरमिनियां ने उस पर पैबन्‍द लगा दिए थे। मुड़ेठे को बटेसर ने सिर पर बांधा और गमछा कन्‍धे पर रख लिया। चमरखानी जूते कोने में पड़े थे। दोनों जूतों को दाहिने पैर के अंगूठे से जमीन पर पटक-पटक कर उसने झाड़ा और हाथ में लाठी लेकर वह चल पड़ा। जाने के समय वह किरमिनियां को गरज कर कहना नहीं भूला वह विशनपुर जा रहा है संझा तक लौट आएगा।

सड़कों पर धूल जमी थी। फगुवा बीत चुका था। दूर खेतों में किसी चरवाहे की चैती धुन सुनाई पड़ रही थी। बटेसर ने अपने खेतों की ओर नजरें की। रबी पकनी शुरु हो गई है। बैहार में कटनी हो रही है। वह भी कल से अपनी रब्‍बी काटना शुरु कर देगा। ज्‍यादा पकने से बूंट की ढेड़ियां टूट कर झड़ जाती हैं। गांव का चरवाहा, गैना हर बथान से मवेशियों को खोल कर मैदान में चराने के लिए ले जा रहा था। मवेशियों के खुरों से धूल का गुब्‍बार उठा और उसमें बटेसर के खेत छिप गए।

उसे गुस्‍सा आ गया। अभी ही इस छोकरे को माल-जाल खोल कर ले जाना था। दोपहर हो जाने को है और अब यह जानवरों को चराने ले जा रहा है। भला क्‍या चरेंगे ये! खाली पोखर से पानी पिला कर यह छोकरा वापस ले जाएगा उन्‍हें यह गैना आजकल बड़ा कामचोर हो गया है दिन भर गुल्‍ली खेलता फिरेगा। गाय-बैलों के झुण्‍ड सड़क पार कर मैदान में चले गए। बटेसर तनिक रुक गया। धूल का गुब्‍बार हट जाए तो फिर वह आगे बढ़े। तभी सामने से डाकिया आता दिखलाई दिया। डाकिए ने बटेसर को देखते ही चिटि्‌ठयों में से एक पोस्‍टकार्ड निकाला और उसको बोला..........‘‘तुम्‍हारी चिट्‌ठी है, बटेसर भाय!''

चिट्‌ठी! यह चिट्‌ठी-पत्री कौन लिखने लगा बटेसर को! हाँ, पहली शादी हुई थी तो सावित्री के एक-दो पोस्‍टकार्ड आए थे। वह थोड़ा-बहुत पढ़ना-लिखना जानती थी, लेकिन उससे तो रिश्‍ता टूटे सत्रह साल बीते। अब वह पोस्‍टकार्ड क्‍यों लिखने लगी! और भला उस हरजाई का पोस्‍टकार्ड बटेसर लेगा ही क्‍यों! डाकिए ने पोस्‍टाकर्ड बटेसर की ओर बढ़ाया तो बटेसर पूछ बैठा, ‘‘कहाँ से आया है पोस्‍टकार्ड? किस ने लिखा है गैवी भाई?''

‘‘तुम तो पढ़ना जानते हो। खुद ही पढ़ लो, बटैसर भाय। मुझे देखो न कितनी चिटि्‌ठयां बांटनी हैं। आज एक ही दिन कई गांवों के बिट पड़ गए हैं।'' गैवी डाकिया आगे बढ़ गया और बटेसर पोस्‍टकार्ड को ध्‍यानपूर्वक देखने लगा। टेढ़े-मेढ़े अक्षर, नाम तो उसी का लिखा है........बटेसर मड़र, गांव पकरा। बिल्‍कुल ठीक? किस ने भेजा है पोस्‍टकार्ड!

वह अक्षरों को जोड़-जोड़ कर पढ़ने लगा, लेकिन धूप में पोस्‍टकार्ड पर लिखे अक्षर चमकने लगे और वह पढ़ने में जब असमर्थ हो गया तब सड़क के किनारे पेड़ की छाया में खड़ा होकर अक्षरों को मिलाने लगा। एक-एक अक्षर पढ़ता और उसके चेहरे पर विभिन्‍न भाव उभरने लगते। उसकी आँखें लाल हो गइर्ं और नथुने फड़कने लगे हूँ, कुतिया, तो एक पोस्‍टाकार्ड लिखा है उसकी हरजाई सावित्री ने! कैसे हिम्‍मत हुई उसे यह चिट्‌ठी लिखने की उससे अब उसको क्‍या लेना-देना! सत्रह वर्ष पहले ही उससे उसका सब नाता-रिश्‍ता टूट चुका है। उसकी करनी ही ऐसी हुई कि बटेसर को उस से नाता तोड़ना पड़ा। बनी थी कभी उसकी बहू। की थी कभी शादी उससे। सुख से रखता भी उसे बटेसर। लेकिन गोबरबिछनी कभी कोहबर में रही है भला! कुतिया का कहीं एक हंडी से पेट भरा है! बिना सात हंडिये चाटें कभी चैन मिला है उसे। सावित्री भी तो कुतिया की ही जात निकली।

लिखती है, तुम्‍हीं मेरे देवता हो.....तुम्‍हीं मेरे पित्तर हो, तुम्‍हीं मेरे गोसांय! हूँ, सतरह बरस पहले यह नहीं सूझता था। अब याद आया है अपना देवता सांय! वह भला बने उस हरजाई-छिनार औरत का सांय! उसका खानदान कितना ऊँचा! कितना अज्‍जतदार! बप्‍पा, जगेसर मड़र उकस बेटा बटेसर मड़र। भला उसकी बराबरी क्‍या! यह तो परझरका मुखिया ही था जिसने बप्‍पा को धोखा देकर सावित्री से उसका व्‍याह करवा दिया था। बप्‍पा तो सीधा-साधा आदमी, बिल्‍कुल गौ। उसको क्‍या मालूम सावित्री का चरित्तर।

बहुत दिन हुए, भूल गया है बटेसर सावित्री को। उसको छोड़े हुए पूरे सतरह वर्ष बीत गए। अब उसके कहने से ही क्‍या उसका वह सांय बन जाएगा! लिखती है, जड़ैया बोखार है। आखिरी वक्‍त आ गया है। नहीं बचेगी। एक बार उसको देखना चाहती है। अपने पाप का पराछित कर लेगी।

जड़ैया बोखार नहीं आएगा तो क्‍या आएगा तुम्‍हें! और जाओ सात मरदों की खटिया पर। बच कर ही कौन-सा उजागर करोगी! पाप का पराछित भला तुम को इस जिन्‍दगी में कभी मिलने वाला है! उसे क्‍या और कोई काम नहीं है जो वह जाए उसे देखने को, जिसकी छैयां तक से हड्‌डी बिसा जाए।

बटेसर ने पोस्‍टकार्ड को घृणा से एक बार देखा और उसके टकड़े-टुकड़े कर कहीं धूल में मिला दिया। सावित्री की जब भी याद आती है उसकी छाती जलने लगती है, पिल्‍ही चमक उठती है और तब उसे लगता है जैसे उसने बोतल भर दारु पी ली हो।

उसने तेजी से पैर उठाए, पगडण्‍डी से आगे बढ़ा और नदी को शीघ्र ही पार कर गया। विसनपुर जाने में एक पहर तो जरुर लगेगा। वह अब फिर सावित्री के बारे में बिल्‍कुल नहीं सोचना चाह रहा था। उसे घृणा थी सावित्री से। शादी के बाद पहली बार वह ससुराल गया था। बप्‍पा ने सनेसा में क्‍या नहीं दिया था......चूड़ा, लडुवा, मिठाय, एक कड़ाही दही। सावित्री के लिए नूंगा-अंगिया, साया-सिनूर और न जाने क्‍या-क्‍या। उतना याद नहीं! कितना प्‍यार करता था सावित्री को वह। बप्‍पा भी उसे देख कर बहुत खुश था।

सांझ-सकारे ही वह ससुराल पहुँच गया था। रात होने पर जब सावित्री उसके पास आई थी तो कितनी सुन्‍दर लगी थी वह बटेसर को! सावित्री को छाती से सटा कर उसका गरम हाथ अपने हाथ में लिए काफी देर तक बटेसर बातें करता रहा था, फिर उसे किस समय नींद लगी पता नहीं। अचानक उसे लगा कि सावित्री अपना हाथ उसके हाथ से छुड़ा रही है और उसका बदन ढीला होता जा रहा है। बटेसर की नींद उचट चुकी थी, फिर भी वह अपनी आँखों को बन्‍द किए हुए था।

सावित्री खाट से उतरी और घर की किवाड़ खोलकर बाहर हो गई। बटेसर ने जब आँखें खोलीं तो उसने देखा, घर में डिबिया की मद्धिम रोशनी हो रही है और सावित्री गायब है। वह भी तेजी से बाहर गया, सावित्री तब तक दहीज पार कर चुकी थी।

बटेसर को बड़ा ही अजूबा लग रहा था कि इतनी रात को सावित्री अकेले क्‍यों बाहर निकली! निकाश-पेशाब के लिए जाती तो अपनी माँ को जगा लेती। बटेसर को ही उठा देती तो क्‍या हरज था! वह यकायक इस तरह गायब क्‍यों हो गई!

बटेसर भी लपका, सावित्री तेजी से गांव की गलियेां को पार कर रही थी। आधी रात हो चुकी थी। कुत्ते जोर-जोर से भूंक उठते थे, लेकिन सावित्री को कोई डर ही नहीं जैसे वह पहले से ही कुछ सोच-विचार करके निकली हो।

सावित्री नुक्‍कड़ पर रुक गई और सामने के दरवाजे को उसने आहिस्‍ता से खटखटाया। यह सावजी की दूकान थी, बटेसर को याद आया। तनिक देर में ही दरवाजा खुला और सावित्री अन्‍दर हो गई। दरवाजा फिर बन्‍द हो गया। बटेसर ने सोचा, दरवाजा खोलने वाले को सावित्री के आने का पहले से ही अहसास रहा होगा क्‍योंकि दरवाजा बन्‍द होने के साथ ही शान्‍ति हो गई।

बटेसर की छाती धौंकनी की तरह तेज हो गई। वह दम साधे दरवाजे के सामने जा कर खड़ा हो गया। भीतर सांसों की आवाज के साथ कुछ फुसफुसाहट हो रही थी। बटेसर के पांव जमीन में जैसे गड़ गए। उसने सोचा, जल्‍दी से वह यहाँ से भाग जाए लेकिन वह वहाँ से हट नहीं पाया और सावित्री के निकलने का इन्‍तजार करता रहा।

थोड़ी देर में ही शान्‍ति हो गई थी। भीतर कोई खटिया पर से नीचे उतरा शायद। ‘नहीं-नहीं मुझे पचास रुपये दे दो, सावजी।' बटेसर ने सावित्री की बोली पहचान ली।

‘पचास!' यह एक मर्द की आवाज थी ‘पचास!'

‘हाँ-हाँ पूरे पचास, आज मेरा आदमी आया है। कल से हमारे घर में खाने को कुछ भी नहीं है, तुम्‍हें तो मालूम ही है, घर का खर्चा तुम से ही चलता है। इस के अलावा माँ ने मेरा छल्‍ला और नथिया बनकी रख दी है। उन्‍हें छुड़ाने में पूरे पचास लगेंगे। पचास रुपये दे दो। सुबह मेरा आदमी मेरे जेवर नहीं देखेगा तो सोचेगा शायद बेच-बाच कर खा गई। माँ की बदनामी होगी। और हाँ, भोर होते ही चावल-घी भिजवा देना।''

‘तुम्‍हारा आदमी आया है? अब तो तुम्‍हें विदागरी करा कर ले जाएगा। लेकिन मेरा हिसाब?'

‘मैं अभी जिन्‍दा हूँ, सावजी, सब हिसाब चुकता कर जाऊंगी।' इस बार सावित्री शायद गुस्‍से से बोली क्‍योंकि तुरन्‍त ही दरवाजा जोर से खुला और वह बाहर निकल आई।

बटेसर पिछवारे में छिपा रहा और जब सावित्री चली गई तब वह भी घर में आ गया। वहाँ सावित्री पहले से ही मौजूद थी और जब उसने अपने पीछे बटेसर को खड़ा देखा तो वह सकपका गई। उसने अपनी आँखें नीचे कर लीं और घबराती हुई बोली, मैं, मैं जरा बाहर गई थी, तुम कहाँ चले गए थे?''

मैं तुम्‍हें देखने गया था कि तुम कहाँ गईं थी। क्‍या यह भी मुझे ही बताना पड़ेगा?''

बटेसर का गुस्‍सा सातवें आसमान से छू रहा था। उसके सारे शरीर का खून दिमाग पर चढ़ गया। आग बबूला होकर उसने सावित्री का नूंगा खोल दिया था। साया की डोरी फट-से टूटी थी और साया नीचे को सरक गया। सावित्री बिल्‍कुल नंगी हो चुकी थी।

सावित्री बिल्‍कुल काठ। जैसे बदन में एक भी बूंद खून नहीं बचा हो लेकिन बटेसर को उस सयम इतना गुस्‍सा था कि अगर उसके पास हथियार मौजूद होता तो वह सावित्री के दो टुकड़े कर देता।

वह अपने गुस्‍से को दबा नहीं पाया। उसने सावित्री को नीचे जमीन पर पटक दिया और उसकी छाती पर चढ़ कर उसका गला जोर से दबा दिया।

सावित्री चिचिया उठी थी। उसने अपना हाथ खोल दिया और दस-दस के पांच नोट जमीन पर फैल गए। बटेसर का शक पक्‍का हो गया।

अगर बटेसर कुछ देर और सावित्री का गला दबाए रह जाता तो उसी दिन सावित्री सीधे स्‍वर्ग में चली जाती लेकिन बटेसर को तुरन्‍त ही होश आ गया। ‘यह तुम क्‍या कर रहे हो,' बटेसर? एक हरजाई की जान लेकर तुम क्‍यों पाप के भागी बनते हो! छोड़ दो इसे ‘‘अपने पाप का फल इसे खुद भोगने दो।''

बटेसर उसी रात सावित्री से सारा रिश्‍ता तोड़कर भाग आया था अपने गांव। उसने बप्‍पा को सब बातें खोलकर बता दी थीं। बप्‍पा को भी गुस्‍सा आया था और ठीक दसवें ही दिन उसकी दूसरी शादी करवा दी थी उसने। फिर साल लगते ही किरमिनियां बेटी हुई। अब वह जवान हो गई है।

जब केवल उसे इसी किरमिनियां की चिन्‍ता है। उस दोगली और बदजात सावित्री को वह अपने दिमाग में कभी लाना नहीं चाहता। ढलते सूरज को देख कर बटेसर को लगा, अब थोड़ी ही देर में सांझ होने वाली है। अचानक सामने की बस्‍ती को देख कर वह ठिठक कर खड़ा हो गया।

अरे, यह कहाँ आ गया वह? अपनी पहली ससुराल........सावित्री का गांव, गाही! वह जा रहा था बिसनपुर तो गाही कैसे पहुँच गया! फिर उसे याद हो आया, गाही और बिसनपुर सटी-सटी बस्‍तियां हैं। दोनों में केवल एक बगीचे का फरक है। गाही के बाद बगीचा टपो तो बिसनपुर पहुँच जाओं। लेकिन बिसनपुर गाही को छोड़कर भी तो जाया जा सकता है। उसे पिछली नुक्‍कड़ से ही मुड़ना चाहिए। यह तो वही रासता है जिस रास्‍ते से वह सतरह बरस पहले सावित्री के दरवाजे पर पहुँचा था। अब, भला वह क्‍यों जाए वहाँ! वह उल्‍टे पांव वापस आया और दूसरे रास्‍ते से बुलाकी चौधरी के द्वार पर पहुँच गया।

बुलाकी चौधरी द्वार पर बैठा था, खलिहानों मे ंरब्‍बी की दौनी हो रही थी। बथान पर बीसों गाय-भैसें सानी खा रही थीं। नौकर-चाकर चलते-फिरते नजर आ रहे थे।

‘‘सच्‍चे, कितना बड़ा गृहस्‍थ है!'' बटेसर ने मन ही मन कहा, ‘यह रिश्‍ता हो जाए तो कितना अच्‍छा! जिन्‍दगी सुगारथ। बेटी सुख करती रहेगी।' उसने बुलाकी चौधरी को अपना और बप्‍पा का परिचय दिया। फिर अपने मन की बात कही और बुलाकी चौधरी ने जो उसके जवाब में कहा उसे सुनकर बटेसर के पांव के नीचे की जमीन खिसकने लगी।

तीन हजार रुपये नगद और दो हजार भरना! यानी पांच हजार देने पड़ेंगे बुलाकी चौधरी को और तब उसका पोता ले जा सकेगा। बटेसर अपनी किरमिनियां के लिए। बुलाकी चौधरी की बातों की रुखाई से बटेसर को रोने का मन हुआ। उसकी छाती बैठ गई और वह ज्‍यादा देर वहाँ रह नहीं पाया। बुलाकी चौधरी ने उससे सीधे बनयौटी बातें की थीं तराजू पर चढ़ा कर। न एक चौठी कम और न एक चौठी बंसी। सब रुपये लाओ और जमाई ले जाओ जैसे जमाई न होकर कोई बैल हो। अँधेरा हो चुका था। रास्‍ता धुँधलाया लगता था। बटेसर के पैर तेजी से उठ रहे थे लेकिन मन खिन्‍न था। बुलाकी चौधरी की बातों ने सब गुड़-गोबर कर दिया था। बहुत आसरा लेकर आया था वह लेकिन सब पानी, और सचमुच उसकी आँखों में पानी भर आया था। लगा उसे, वह रो रहा है लेकिन वह नहीं रो रहा कोई और रो रहा है। पास ही कहीं से किसी के रोने की आवाज है।

अरे, वह तो फिर रास्‍ता भूल गया। यह तो गाही बस्‍ती है और बटेसर एक घर के सामने खड़ा है। कहाँ आ गया वह! उसे कुछ भी सूझ नहीं रहा है। हाँ-हाँ यह घर तो सावित्री का ही है। वही घर जिसे सतरह बरस पहले छोड़ कर अपने गांव रातोरात भागा था वह। अब वह यहाँ क्‍या लेने आया है! किरमिनियाँ को ब्‍याह नहीं पाएगा। क्‍या यही सुनाने आ गया सावित्री को बटेसर! लेकिन उस हरजाई को यह किस्‍से सुना कर क्‍या मिलेगा उसे।

गलियों में लोगों की हलचल।

‘‘कौन रो रहा है भई! किस को क्‍या हो गया?'' पूछा किसी से बटेसर ने।

‘‘सावित्री मर गई!''

तो सावित्री मर ही गई! बटेसर के पैर धीरे से आंगन में आ गए। बीच आंगन में लाश को घेरे खड़े हैं लोग। यही वह आंगन है। यही वह घर है जहाँ एक दिन बटेसर सावित्री की जान लेने को तैयार हो गया था और आज वह खुद चली गई। अपने पापों का प्रायश्‍चित कर गई।

कुछ लोग बोल रहे थे, ‘‘बड़ी अच्‍छी थी बेचारी, सब की मदद किया करती थी। गांव में कौन ऐसा है जिसने उस का पैसा नहीं खाया हो!''

एक अजनबी को देख कर सब की नजरें बटेसर पर जम गइर्ं। कुछ बूढ़े लोगों ने उसे पहचान लिया। अरे, यह तो बटेसर है। खैर, आ गया बेचारा ऐन मौके पर। सब दिन तो बेचारी सावित्री इसी का नाम जपा करती थी। हाय-हाय, कुछ देर पहले तुम आ गए होते तो बेचारी तुम्‍हारे पांव पर ही दम तोड़ती।

बटेसर ने सोचा, अब उसे यहाँ से चल देना चाहिए। लोग जबर्दस्‍ती कहेंगे कि अब सावित्री का क्रिया-कर्म तुम्‍हीं करो। तुम्‍हारी ही तो औरत थी। इस बुढ़ारी पर कहीं हरजाई की लाश नहीं छूनी पड़ जाए। उस की तो हड्‌डी बिसा जाएगी। तभी गांव का मुखिया आ गया और उसने जब जाना कि बटेसर आ गया है तो उससे कहा, ‘बटेसर, तुम्‍हारे लिए सावित्री एक कागज लिख गई है। अपना घर-मकान, तीन बीघे जमीन, नकद और जेबर सब तुम्‍हारे नाम करके मर गई।

लो यह कागज संभाल कर रखो और साथ-ही-साथ एक रुक्‍का भी उसने दिया है जिसमें कर्ज की वसूली लिखी है। यह रुक्‍का खासकर तुम्‍हारे हाथों में देने को बोल गई है वह। शायद उसने कभी गांव के सावजी से पचास रुपये कर्ज में लिए थे।' पचास रुपए! पांच दसटकिया नोट! बटेसर को उस रात की घटना की याद दिमाग पर चढ़ कर चोट करने लगी, तो क्‍या वे रुपये सावित्री कर्जा कर ले आई थी! वह क्‍या कर गुजरा तू बटेसर! एक निर्दाेष को तू ने हरजाई बना दिया। जरा भी उससे सफाई लेने का तुझे धीरज न रहा। तेरे ही कारण बेचारी सावित्री मर गई।

बटेसर को उसी क्षण अपना माथा फोड़ लेने का मन हुआ लेकिन वह जहाँ खड़ा था वहीं खड़ा रह गया। उसने पल भर विचारा, वह इस कागज को ले या नहीं ले। उसकी आँखों से झरझर आँसू बह रहे थे। धुंधली नजरों के आगे किरमिनियां का चेहरा एकबार फिर घूम गया और दिमाग में अपने गांव के मुखिया का रुक्‍का। अनायास उसका हाथ कागज की ओर बढ़ गया।

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मनोरम-2/32, स्‍टेट बैंक कॉलोनी-2,

खजपुरा, पटना-800014,

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