शनिवार, 11 जून 2011

शशि पाठक का कहानी संग्रह - अपरिमित : (7) अंधेरे के बाद

अपरिमित

(कहानी संग्रह)

श्रीमती शशि पाठक

प्रकाशक

जाह्‌नवी प्रकाशन दिल्‍ली-32

© श्रीमती शशि पाठक

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अंधेरे के बाद

प्रभात का पत्र पा, आज मैं अपने आपको एक असमंजस की स्‍थिति में फंसा हुआ महसूस कर रही हूँ। एक ओर पुत्र, पुत्रवधू और पोती को देखने की चाहत में दिल में प्रसन्‍नता का सैलाब उमड़ा पड़ रहा है। वहीं दूसरी ओर उनके पहले आगमन की याद, एक कसक बनकर सीने में चुभने लगती है।

मन हर आहट पर रोमांच से भर उठता था। बार-बार यही लगता शायद वह आ गया। जब से उसका पत्र मिला तभी से मन में एक अजीब खुशी का अहसास होने लगा था। इन्‍तजार की घड़ियाँ काटे नहीं कट रही थीं। आज मेरी वर्षों की तपस्‍या का फल साकार हो रहा है।

गरीबी में पली, बढ़ी मैं, हमेशा पिता की मजबूरी देखकर अपनी इच्‍छाओं का दमन करती रही। पढ़ाई में तेज होने के कारण वजीफा मिलता रहा जो पढ़ाई को आगे बढ़ाने में सहायक रहा। बहुत इच्‍छा थी कि मैं डॉक्‍टर बनूँ। पिताजी अस्‍पताल में कर्मचारी थे। उनके साथ कभी अस्‍पताल जाती तो वहाँ सफेद ड्रेस पहने डॉक्‍टर को इधर से उधर घूमता देख, मेरे अन्‍दर डॉ॰ बनने की इच्‍छा बलवती होने लगती। मन ही मन तय करती कि चाहे कुछ भी हो मैं डॉक्‍टर अवश्‍य बनूँगी। लेकिन सभी भाई-बहनों में बड़ी होने के कारण और परिवार के संस्‍कारवश मेरी इच्‍छा मन में ही दफन हो गई और मैं कभी अपना सिर न उठा सकी।

कॉलबेल की आवाज ने मेरी तंद्रा भंग कर दी, शायद वह आ गया। सोचकर उमंग से उठी और दरवाजा खोल दिया। पर सामने दूध वाले को देख सारी उमंग ठंडी पड़ गई।

‘‘बीबीजी, आज से दूध एक रुपया मंहगा हो गया है।'' बर्तन में दूध डालते हुए वह बोला।

‘‘अच्‍छा, ठीक है। पर कल से ज्‍यादा दूध लाना।''

‘‘काहे बीबीजी, कोई आत रहे का?''

‘‘हाँ, प्रभात आ रहा है।''

‘‘फिर तो बहुत खुशी की बात है।''

मैंने दूध लेकर, किचिन में जाकर गैस पर चढ़ा दिया। लगता है अब मेरे दुख के बादल छँट जायेंगे। बचपन से इस उम्र तक क्‍या कभी मैंने चैन की सांस ली है। शुरू से ही अपनी इच्‍छाओं का दमन करती रही और धीरे- धीरे जैसे सब इच्‍छाएं ही मर गईं सिवाय एक इच्‍छा के, जो सोते-जागते मेरे अवचेतन में रहती। ये नहीं कि मैंने कोशिश ही नहीं की। प्रवेश-परीक्षा में बैठी भी। प्रतीक्षा सूची में नम्‍बर भी आ गया। पर अचानक पिताजी की तबीयत ही खराब हो गई। उनको हार्ट अटैक पड़ा था। दूसरा अटैक जाने कब पड़ जाए, इन सारी मजबूरियों को देखते हुए, किसी तरह का विद्रोह छोड़ मुझे विवाह के लिए मजबूर होना पड़ा। कुछ ही दिनों में ससुराल आई जहाँ सभी का भरपूर प्‍यार मिला। लेकिन जो मेरी जिन्‍दगी का सहारा था उसे हर रात शराब के नशे में धुत किसी न किसी का सहारा लेकर घर आना पड़ता। मैं चुपचाप इसे भी सहती रही। अब समझ में आया कि मुझ जैसी गरीब लड़की से ही इन्‍होंने शादी क्‍यों की।

दो-तीन महीने बाद पता चला कि मैं माँ बनने वाली हूँ तो मैंने आने वाले बच्‍चे का वास्‍ता देकर रोते हुए कहा - ‘‘देखो, शराब मत पीया करो।' आखिर आपको परेशानी किस बात की है? अब तो आप पिता भी बनने वाले हैं। कुछ तो सोचिए।''

मना तो पहले भी रोज ही करती थी पर आज की बात का इन पर जो असर हुआ उससे मैं फूली न समाई। इन्‍होंने खुश होते हुए मुझे बाहों में भर लिया और गोल-गोल घुमाते हुए बोले- ‘‘सच कह रही हो? मेरा बेटा आ रहा है। तो मैं यह झूठा सहारा आज से छोड़ दूंगा। बिलकुल छोड़ दूंगा।''

और सचमुच ही इन्‍होंने कई दिन तक शराब को हाथ नहीं लगाया। मैं बहुत खुश हुई। पर यह खुशी भी स्‍थाई न रही सकी। भगवान किसी-किसी की किस्‍मत में खुशी के क्षण इतने कम क्‍यों लिखता है? मन सुबह से ही जाने कैसा-कैसा हो रहा था। किसी भी काम में मन नहीं लग रहा था। उस दिन सुबह से ही वर्षा हो रही थी। थोड़ी-थोड़ी देर बाद बिजली कड़क रही थी। धीरे-धीरे रात भी घिर आई पर ये घर नहीं लौटे। मन अनगिनत आशंकाओं से घिर उठा। हर आहट पर बेचैन हो उठता। तभी दरवाजे की घंटी बज उठी।

दरवाजा खोलकर देखा तो मेरी चीख निकल गई। खून से लहूलुहान इनका शरीर, पड़ोसी रामनाथ लिए हुए थे। मुझे सामने देख एकदम रुंआसे होकर बोले- ‘‘भाभीजी, मेरा दोस्‍त मुझसे रूठकर चला गया।''

अचानक ये देख मैं अवाक्‌ रह गई। थोड़ी देर तक बुत बनी खड़ी रही फिर बेहोश हो गई। होश आने तक सब कुछ शान्‍त हो चुका था। बाद में पता चला कि एक ट्रक ने इन्‍हें टक्‍कर मार दी थी।

कुछ दिन तो यूँ ही निकल गए। आखिर मैंने कुछ करने की ठान ली। पहले लोगों के कपड़े सिलने शुरू किए फिर उनके छोटे-छोटे बच्‍चों की देखभाल और ट्‌यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया। इस तरह अपना और प्रभात का गुजारा हो जाता। जो मजबूरियाँ कभी मेरी पढ़ाई में बाधा बन गई थी। अब तो मेरे सामने एक ही उद्देश्‍य था- प्रभात को पढ़ाकर डॉक्‍टर बनाना।

धीरे-धीरे प्रभात मेरी आशा के अनुरूप पढ़ता रहा। प्रवेश परीक्षा पास कर वह मैडीकल कॉलेज में पढ़ने लगा। हमेशा पढ़ाई में उच्‍च स्‍थान प्राप्‍त करने के कारण उसे सरकार की ओर से आगे की पढ़ाई हेतु विदेश भेज दिया गया। मेरी प्रसन्‍नता की सीमा न रही। मेरा सपना जो पूरा होने वाला था।

कॉलबेल की तेज आवाज ने मेरी विचारश्रृंखला भंग कर दी। दरवाजा खोलकर देखा, डाकिया खड़ा था।

‘‘बहन जी, आपका तार।''

‘‘तार'' शब्‍द सुनते ही मेरा समूचा अस्‍तित्‍व हिल-सा गया। किसी भावी आशंका से मन काँप उठा। धीरे-धीरे मैं अचेत हो गई। होश आने पर देखा, दिन ढल चुका था। दिन भर की सारी बातें, फिर याद आने लगीं। तार का ध्‍यान आते ही सारे शरीर में कंपकंपी होने लगी। क्‍या मेरे जीवन में सुख का एक भी पल नहीं है। डरते-डरते तार खोलकर पढ़ा तो खुशी से झूम उठी। लिखा था- हम दस जून की शाम को भारत पहुँच रहे हैं।

घड़ी की ओर देखा, साढ़े छह बज रहे थे। अभी तक क्‍यों नहीं आया। प्रतीक्षा का एक-एक पल युगों लम्‍बा लग रहा था। साथ ही पत्र के हर शब्‍द पर कई प्रश्‍न मन में उठ रहे थे। थोड़ी ही देर में मेरे सभी प्रश्‍नों का उत्‍तर मिल गया था। प्रभात अपनी विदेशी पत्‍नी के साथ एयर पोर्ट से निकल सीधा होटल में ठहर गया। जहाँ से उसने टेलीफोन पर अपने आने की सूचना दी थी। होटल पहुंचकर मैंने सवालिया नजरें प्रभात के चेहरे पर टिका दीं तो वह एकदम से सकपका गया ‘‘माँ वो.... आपकी बहू को उस छोटे घर में रहने में असुविधा होती इसलिए....।''

हाँ, वही घर जहाँ मैंने प्रभात को पाला-पोसा, पढ़ाया-लिखाया था। वही घर आज उसकी पत्‍नी के लिए छोटा और असुविधा वाला हो गया था। अपने दिल की हूक दिल में ही दबा, मैं होटल से घर आ गई थी। सोचते हुए शायद मेरे जीवन में सुख लिखा ही नहीं। सुख होता तो पति ही क्‍यों मंझधार में छोड़ जाते, या फिर स्‍वयं के संघर्षों से मैंने प्रभात को सुख देने योग्‍य बनाया तो वह भी पराया हो गया। क्‍या मिला मुझे? जीवन के सुख-दुख के जोड़-घटाने में ऐसी खोई कि कॉलबेल की तेज आवाज भी बहुत देर तक सुनाई न पड़ी। उठकर दरवाजा खोला। सामने प्रभात, बहू और छोटी बच्‍ची के साथ खड़ा था।

‘‘अरे, तुम लोग!......'' खुशी के मारे उसके शब्‍द गले में ही अटक कर रहे गये।

‘‘हाँ, माँ।'' कहकर दोनों मेरे पैरों पर झुक गए।

पर दूसरे ही क्षण अतीत का दंश मन को फिर घायल कर गया और मैं आशंकित-सी पूछ बैठी- ‘‘क्‍यों होटल में ठहरने का प्रबन्‍ध नहीं किया बहू के लिए?''

‘‘नहीं, माँ अब हम यहीं पर रहेंगे और यहीं पर अपना क्‍लीनिक भी खोलेंगे, आपके पास ही। देखो न, मैंने अब हिन्‍दी बोलना भी सीख लिया है।'' विदेशी बहू के मुँह से हिन्‍दी में बोले गए ये शब्‍द जैसे मिश्री घोल गए और प्‍यार की उमड़ती बाढ़ को मैंने अपनी पोती पर उड़ेल दिया।

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(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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