शनिवार, 11 जून 2011

शशि पाठक का कहानी संग्रह - अपरिमित : (8) निर्दोष

अपरिमित

(कहानी संग्रह)

श्रीमती शशि पाठक

प्रकाशक

जाह्‌नवी प्रकाशन दिल्‍ली-32

© श्रीमती शशि पाठक

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निर्दोष

माँ का पत्र पढ़कर मैं किंकर्त्तव्‍यविमूढ़-सा कुछ देर तक बैठा रहा। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्‍या करूँ। पत्र में लिखी पंक्‍तियों ने दिमाग में बवण्‍डर मचा दिया था। मैं जितनी बार भी उसको पढता उतनी ही बार दिमाग की नसें खिंचने लगतीं। ‘‘बेटा, अगले महीने की बीस तारीख को तुम्‍हारी सगाई और उसके ठीक दस दिन बाद शादी होना निश्‍चित हुआ है। इसलिए तुम अवकाश लेकर शीघ्र आने का प्रयत्‍न करना।'' पढ़कर मेरा मुँह कसैला हो गया था। क्‍या इस आशय का ये माँ का पहला पत्र है? नहीं ऐसा ही पत्र आज से ठीक दो साल पहले भी आया था। इसी तरह लड़की और लड़की के घर-परिवार की प्रशंसा से भरा हुआ। लेकिन उस पत्र के आने के बाद दिल एकदम झूम उठा था। पैर जमीन पर नहीं टिकते थे। मन खुशी के मारे पागल हुए जा रहा था। होता भी क्‍यों न। एकाकी जीवन से ऊब हो चली थी। दिल करता- कोई तो ऐसा हो जो मेरे दुख-सुख में भागीदारी करे।

माँ के पत्र में लड़की की प्रशंसा कुछ इस तरह की गई थी कि एक धुंधला-सा रेखाचित्र मेरी आँखों के समक्ष उपस्‍थित हो गया था। दान-दहेज भी खूब लिखा था। जब से माँ का पत्र मिला, मेरा मन दिन-रात कल्‍पना लोक में विचरण करने लगा था। मित्रों ने बारात में जाने की तैयारी शुरू कर दी थी। फिर दूसरे पत्र में माँ ने लड़की की फोटो भी भेजी थी जिसे देख मैं एकदम दीवाना हो उठा। फोटो में वो स्‍वर्ग की अप्‍सरा लग रही थी। अब उसका फोटो दिन भर मेरे पर्स में रहता और रात को तकिये के नीचे।

एक बार मेरे अभिन्‍न मित्र गणेश ने वह फोटो जाने कैसे हथिया लिया। पर्स में फोटो न पा मैं एकदम बौखला उठा तो वह हँसते हुए बोला, - ‘‘अरे, बौखलाता क्‍यों है, फोटो ही तो है और फिर कल तो तुम जा ही रहे हो। मात्र आठ-दस दिन की ही तो बात है। फिर साक्षात ही मिल लेना।''

उसकी बात सुनकर भी जब मैं झुंझलाता रहा तो मुझे फोटो देते हुए वह बोला- ‘‘ले देवदास, रख ले। हमें क्‍या पता था कि तू इतना......''

उसकी बात अनसुनी कर मैंने उससे फोटो लेते हुए पूछा, - ‘‘ये तुझे कहाँ, कब और कैसे मिला?''

इतने सारे प्रश्‍नों की बौछार से जरा भी विचलित हुए बिना, अपने कान पकड़ते हुए वह बोला- ‘‘तेरे तकिये के नीचे, सुबह धोबी को चादर और तकिये के गिलाफ देते समय मिला। बस.... या और कुछ .....'' कहते हुए वह दफ्‍तर को रवाना हो गया।

उसके जाने के बाद मैं भी अपना सूटकेस ठीक करने लगा और आठ बजे की रेलगाड़ी से घ्‍ार पहुँच गया। रास्‍ते भर खुशी के मारे मन फूला नहीं समा रहा था। ऐसे लग रहा था जैसे मार्ग की प्रत्‍येक वस्‍तु मेरी खुशी में सम्‍मिलित हो, ऊँचे-ऊँचे पेड़, फूलों से भरी क्‍यारियाँ और झूमती गेंहू की बालियों से भरे हरे-हरे खेत, नदी-नाले, सब मेरा अभिनन्‍दन कर रहे हों जैसे।

घर पहुँचकर नित्‍य ही कोई-न-कोई रस्‍म होती। भाभियाँ हँसी-मजाक करतीं और आखिर वह दिन भी आ पहुँचा जब मैं गाजे बाजे के साथ, घोड़ी पर सवार हो, बारात लेकर पहुँच गया।

फूलों के गजरों के बीच, गुलाब-सी खिलती, हाथों में जयमाला लिए वह सखियों के बीच स्‍वर्ग की अप्‍सरा-सी मेरे नजदीक आई और जयमाला मेरे गले में डाल दी। मैं उसके रूप के जादू में ऐसा खोया कि एकटक उसे ही देखता रहा। जाने कितनी देर ऐसे ही खड़ा रहता यदि मेरा मित्र मुझे कोहनी न मारता। हड़बड़ाकर मैेंने भी जयमाला उसके गले में डाल दी। पूरा पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। देर रात तक मण्‍डप में ही भांवर आदि का कार्यक्रम चलता रहा।

बाबुल के यहाँ से विदा हो जब वह सुसराल पहुँची तो सास-ननद और अन्‍य रिश्‍तेदार प्रतीक्षा कर रहे थे। यहाँ आकर भी दिनभर रस्‍म-रिवाजों का सिलसिला चलता रहा। उसके बाद वह क्षण भी आया जिसका हर युवा दिल को जीवन में इन्‍तजार रहता है। शरमाती-सकुचाती-सी बैठी अपनी हृदय स्‍वामिनी का घूँघट जब मैंने उठाया तो मैं उसके चेहरे को देखता ही रह गया। अपने नाम के अनुरूप ही वह पूनम का चाँद थी। उसकी सुन्‍दरता को देख मैं मंत्रमुग्‍ध-सा बोल उठा,- ‘‘आज तुम्‍हें पाकर मैं धन्‍य हो गया। तुम तो साक्षात्‌ रूप की देवी हो।''

‘‘देवता तो आप हैं जो सब कुछ जानते हुए भी मुझ अभागिन को अपना लिया वरना....।'' पूनम ने नजर नीची किए हुए कृतज्ञता प्रकट की तो पुलिस के डण्‍डे को देख जैसे शराबी का नशा हिरन हो जाता है, मेरे सिर से भी थोड़ी देर पहले चढ़ा रूप का नशा, एकदम से हिरन हो गया और मैं चौंक उठा-

‘‘क्‍या, क्‍या जानते हुए..... मैं तो तुम्‍हारे बारे में कुछ भी नहीं जानता। मुझे साफ-साफ बताओ पूनम, आखिर माजरा क्‍या है?''

मेरे बदले हुए रूप को देख, पूनम भयभीत हो उठी और आँखों में आँसू भरकर वह आश्‍चर्य से बोली, - ‘‘आपको मेरे बारे में कुछ भी नहीं पता। मुझे तो बताया गया था कि इस हादसे के बारे में आपको सब कुछ बता दिया गया है और सब कुछ जानते हुए भी आपने मुझे अपनाने का प्रण किया था।''

‘‘हादसा, कैसा हादसा? मुझे तो किसी बारे में कुछ भी पता नहीं। इसका मतलब ये कि मुझसे कुछ छुपाया गया है।'' मैंने उसी आवेश में कहा तो पूनम ने रोते-रोते अपनी सारी कहानी बयान कर दी।

‘‘मैं मात्र दो साल की ही थी। एक दिन माँ मुझे पड़ोसी के यहाँ छोड़ कर, बीमार मौसी को देखने के लिए चली गई। मौका देख पडोसी ने मेरे साथ .... मेरे चीखने-चिल्‍लाने पर सारे पड़ोसी एकत्र हो गये और उस पड़ोसी को पकड़ पुलिस के हवाले कर दिया। मुझे बेहोशी की हालत में अस्‍पताल पहुँचाया गया।'' इतना बताकर वह निरीहता से मेरे मुँह की ओर ताकने लगी, जैसे कह रही हो, अब तुम्‍हीं बताओ, इसमें मेरा क्‍या दोष था। पर मैं पत्‍थर दिल पिघला नहीं बल्‍कि उसी तैश में बोला- ‘‘नहीं, इस सबका हर्जाना मैं नहीं भुगत सकता। समझीं? मैं कोई समाज सुधारक नहीं हूँ।'' बड़बड़ाते हुए मैं कमरे से बाहर आ गया। बाद में पता चला कि पूनम के मम्‍मी-पापा ने मेरे माँ-बाप को सब कुछ बता दिया था। पर उन्‍होंने जानबूझकर ..... ऐसा क्‍यों किया उन्‍होंने। शायद अधिक दहेज का लालच और विवाह योग्‍य होती जा रही तीन-तीन पुत्रियों की खातिर.... या फिर और कोई मजबूरी। मैं जितना सोचता उतना ही उलझता जाता।

पूनम एक बार जो मायके गई तो दुबारा सुसराल नहीं आने दिया मैंने! पूनम को निर्दोष मानते हुए भी मेरे अन्‍दर का ज्‍वालामुखी धधकने लगता और उस ज्‍वालामुखी की आग में मेरे सारे अरमान और खुशियाँ जलकर रह गइर्ं। कई बार सख्‍त बीमार भी पड़ा, पर पूनम को नहीं बुलवाया मैंने। इस पर गणेश उलाहना देकर बोला- ‘‘हद हो गई यार इतनी तबीयत खराब रहती है। भाभी को ले क्‍यों नहीं आता?''

शायद मेरा अंतर्मन भी पूनम का वह अश्रुपूरित चेहरा भूल नहीं पाया था। मेरे अन्‍दर ही अन्‍दर मंथन होता रहता, एक समुद्र मंथन। कि आखिर इसमें पूनम कहाँ दोषी है? लेकिन आवेश में जो कदम उठ गया वो पीछे नहीं हटा पा रहा था मैं। पूनम के माता-पिता भी कई बार मेरे पास आये। वो भी रोते-गिड़गिड़ाते हुए पूछते- ‘‘बताओ बेटा, इसमें पूनम का या हमारा क्‍या दोष है? और मैं निरूत्तर-सा उनकी बातों को अनसुना कर देता। एक लावा-सा मेरे अन्‍दर उठता। पर किसके विरूद्ध? पूनम के या उस पड़ोसी के या फिर उस सामाजिक व्‍यवस्‍था के विरूद्ध? मैं खुद किसी निर्णय पर पहुँच पाने में असमर्थ रहता। और फिर इसे ही नियति मान चुप हो जाता।

लेकिन आज माँ का पत्र पढ़ पूनम की याद ताजा हो उठी। पत्र के साथ संलग्‍न फोटो, पूनम की फोटो में बदल बार-बार मुझसे पूछने लगी, - ‘‘बताओ, आखिर मेरा दोष क्‍या है। बताओ.... मेरा दोष क्‍या है.....।''

सारी रात बेचैनी से करवटें बदलते हुए बीतने लगी। नींद जैसे रूठ गई थी। जब भी सोने का प्रयास करता, पूनम का आँसुओं भरा चेहरा बार-बार सामने आ वही-वही प्रश्‍न दोहराने लगता। बताओ, मेरा क्‍या दोष है? और मैं बेचैन हो उठता।

चिड़ियों की चहचहाहट के साथ ही मैंने खिड़की से बाहर झाँक कर देखा। प्राची में सूर्यदेव अपने रथ पर सवार, पृथ्‍वी पर अपनी रश्‍मियाँ फैलाने की तैयारी में थे। बिस्‍तर छोड़ मैं उठ खड़ा हुआ। नित्‍यक्रिया से निवृत्त हो सूर्यदेव को नमस्‍कार किया और कपड़े पहन, घर से बाहर निकल चला। एक दृढ़ निश्‍चय के साथ माँ को तार करने कि तुम्‍हारा बेटा अब नहीं भटकेगा माँ, अब तक वह बहुत भटक लिया। अब वह जा रहा है, पूनम को लेने के लिए।

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(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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