शुक्रवार, 3 जून 2011

महेन्‍द्र हुमा की दो गजलें

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-1-

ये प्रजातंत्र, बता तुझको पता है, क्‍या है

हम गरीबों का मुखालिफ है, सगा है, क्‍या है

 

बाद मुद्‌दत के मिलीं रोटियाँ ,दो जून मुझे

ये मेरा हक है, मेहनत है, दया है, क्‍या है

 

तेरे आने से संभल जाता है ये कुहना मरीज

तू दवा है कि दिलासा है, दुआ है, क्‍या है

 

मेरे इजहारे हकीकत पे ये तेवर तेरे

सच कोई जुर्म है, गल्‍ती है, खता है, क्‍या है

 

सीबी.आई. से लरज जाते हैं अच्‍छे-अच्‍छे

ये कि तूफान है, आधी है, बला है, क्‍या है

 

ये तेरे जिस्‍म पे धागे की शकल में कपड़े

ये चुनौती है, नुमाइश है, हया है, क्‍या है

 

राजपथ पर सभी बौराये से लगते हैं ‘हुमा'

ये अदा है कि हकीकत है, नशा है, क्‍या है

---

 

-2-

आग जब बरसायेंगी पुरवाइयाँ,

कैसे बच पायेंगी ये अमराइयाँ

 

जिसकी हर कोशिश का मतलब रोटियाँ,

वो क्‍या जाने उम्र की रानाइयाँ

 

उस दुल्‍हन को दोनों चीजें मिल गईं,

आग का शोला मय तन्‍हाइयाँ

 

जिसका खुद बैसाखियाँ हों आसरा,

क्‍या उठा पायेगा जिम्‍मेदारियाँ

 

वो न तेरे औ न मेरे साथ थीं,

रोशनी के साथ थीं परछाइयाँ

 

अब समुन्‍दर हेच लगता है हुमा,

आँसुओं की देख कर गहराइयाँ

 

--

प्रस्तुति- डॉ. दिनेश पाठक‘’शशि' दि.30.05.11

--

(चित्र - अमृतलाल वेगड़ की कलाकृतियाँ)

3 blogger-facebook:

  1. जानदार और शानदार होती है। इस अनूठेपन को बनाए रखने के लिए आभार।
    ======================
    सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी

    उत्तर देंहटाएं
  2. वो तेरे औ न मेरे साथ थीं,
    रौशनी के साथ थी परछाइयां।
    दोनों ग़ज़लियात बेहतरीन लगे , मुबारकबाद।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बाद मुद्‌दत के मिलीं रोटियाँ ,दो जून मुझे

    ये मेरा हक है, मेहनत है, दया है, क्‍या है
    behtareen ghazal.
    ye ghazal hai,gussa hai ki sada hai,kya hai?

    उत्तर देंहटाएं

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