शनिवार, 4 जून 2011

सुधा गुप्ता की रचना - रैन बसेरा [चोका]

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रैन बसेरा [चोका]*

डॉ सुधा गुप्ता

 

रैन बसेरा

चल, उठाले डेरा

हुआ सवेरा

क्या भला यहाँ मेरा

जो कुछ मिला

सब यहीं निबेरा

दु:खों से घिरा

खुद लाचारों -द्वार

था चकफेरा

मेरी मूरखता थी

करुणाघन !

कभी तुझे न टेरा

दो बूँद जल !

मुमूर्षु चातक ने

तुझे है हेरा

एक आस लगी है

तारनहार !

कर दो बेड़ा पार

दीन वत्सल !

करो जुगत ऐसी

फिर से न हो फेरा ।

-0-

*[चोका=जापानी लम्बी कविता, जिसमें 5+7……के क्रम में कविता लिखी जाती है और नत में एक ताँका [5+7-5+7+7] जोड़ दिया जाता है ।

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  1. जीवन के ध्रुव सत्य का डॉ सुधा गुप्ता जी ने अपने चोका में मार्मिक चित्रण किया है तथा अन्त में ताँका से समापन करते हुए दीन वत्सल परमात्मा से मुक्ति की याचना की है । बहुत सुन्दर !

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  2. रैन बसेरा

    चल, उठाले डेरा

    हुआ सवेरा

    क्या भला यहाँ मेरा

    जो कुछ मिला

    सब यहीं निबेरा

    यह दुनिया रैन बसेरा ही तो है.. जो आया है सो जायेगा... इस शास्वत सत्य को बहुत ही काव्यात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है सुधा जी ने. सुधा जी जैसी वरिष्ठ लेखिका की प्रशंसा में कुछ कहना सूरज को दीपक दिखाने वाली बात है.. उनकी सभी रचनाएँ एक से बढ़ कर एक होती हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  3. sudha ji ki rachnaaon ki baat hi alag hai kabhi kabhi to shabd hi nahi milte prasnsha ke liye..

    उत्तर देंहटाएं
  4. अति सुन्दर...मन को छूने वाला...बधाई ।

    उत्तर देंहटाएं
  5. मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति।
    उनकी सभी रचनाएँ एक से बढ़ कर एक होती हैं!
    बधाई ।

    उत्तर देंहटाएं
  6. सुधा जी सुंदर भावों की अद्भुत अभिव्यक्ति .हाइकू,तांका लिखने में तो आपका कोई सानी नहीं है .चोका भी उसी श्रेणी में आता है आप के शब्द और भाव दोनों लाजवाब है
    सादर
    रचना

    उत्तर देंहटाएं
  7. बेनामी11:25 pm

    क्या भला यहाँ मेरा,जो कुछ मिला ,सब यहीं निबेरा
    तारनहार, करो जुगत ऐसी ,फिर से न हो फेरा
    ऐसे भावों से भरा चोका बहुत सुंदर है

    उमेश मोहन धवन

    उत्तर देंहटाएं

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