रविवार, 5 जून 2011

परितोष मालवीय का आलेख - वर्तमान ग़ज़ल में पर्यावरण असंतुलन की अभिव्यक्ति

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वर्तमान ग़ज़ल में पर्यावरण असंतुलन की अभिव्यक्ति

- डॉ. परितोष मालवीय

ग़ज़ल, वर्तमान समय की अत्यंत लोकप्रिय विधा एवं भावाभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। हिंदी भाषा में भी ग़ज़ल की सुदीर्घ परंपरा रही है। स्वातंत्र्योत्तर काल में आधुनिक हिंदी ग़ज़ल की भावभूमि में व्यापक परिवर्तन हुये हैं। आधुनिक काल में ग़ज़ल से तात्पर्य केवल रूमानियत, शराब, प्रेमी-प्रेमिका के आख्यान आदि कदापि नहीं है। आज की ग़ज़ल आज के मुद्दों को उठा रही है, ठीक उसी तरह जैसे साहित्य की अन्य विधाओं में होता है। आज का रचनाकार ज्वलंत सामाजिक मुद्दों पर पैनी नज़र रखता है।

आज के परिवेश में उपजे कुछ ऐसे पहलुओं व सवालों की अभिव्यक्ति वर्तमान ग़ज़ल में व्यापक रूप से मिलती है जो इससे पूर्व कभी अभिव्यक्त नहीं हुए। दरअसल ऐसे मुद्दे सिर्फ आज की सामाजिक व राजनैतिक परिस्थितियों के कारण ही उत्पन्न हुये है जैसे - पर्यावरण पतन, भूमंडलीय तापन या ग्लोबल वार्मिंग, औद्योगीकरण का संकट, बिखरते परिवार व मानवमूल्य, भूमंडलीयकरण, कृत्रिमतापूर्ण जीवन शैली, उपभोक्तावाद आदि।

हिंदी ग़ज़ल को सामाजिक सरोकारों से जोड़ने का क्रांतिकारी कार्य का सूत्रपात संभवतः दुष्यंत कुमार ने ही किया। दुष्यंत कुमार के बाद तो जैसे हिंदी ग़ज़ल को एक नई दिशा एवं ऊर्जा मिल गयी। उनके परवर्ती काल में कई ग़ज़लकारों ने उन्हीं के स्वर में ग़ज़ल कहना शुरू किया। दुष्यंत के बाद हिंदी ग़ज़ल परंपरा में शंभुनाथ सिंह, नरेन्द्र वशिष्ठ, भवानी शंकर, चंद्रसेन विराट, शेरजंग गर्ग, कुंअर बेचैन, नित्यानंद तुषार, ज़हीर कुरैशी, डॉ. सूर्यभानु गुप्त, गिरिराजशरण अग्रवाल, राजेश रेड्डी, विज्ञान व्रत, तुफैल चतुर्वेदी, डॉ. उर्मिलेश जैसे ग़ज़लकारों के अलावा बशीर बद्र और निदा फाज़ली जैसे उर्दू लहज़े के शायरों का नाम लिया जा सकता है। तात्पर्य यह है कि शायद ही कोई ऐसा ग़ज़लकार हो जो अपनी ग़ज़ल में सामाजिक सरोकारों को अभिव्यक्त नहीं करता हो।

चूंकि पर्यावरण प्रदूषण एवं पतन की विकराल समस्या अभी कुछ ही दशक पुरानी है अतः यह कहना गलत नहीं होगा कि सिर्फ वर्तमान ग़ज़ल में ही पर्यावरण प्रदूषण, पारिस्थतिकी असंतुलन व पतन आदि की अभिव्यक्ति हुई है, कुछ दशक पूर्व की ग़ज़लों में नहीं। पर्यावरण प्रदूषण के अंतर्गत जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, वायु प्रदूषण, मृदा प्रदूषण, पारिस्थितिकी असंतुलन, ग्लोबल वार्मिंग इत्यादि आते हैं। वर्तमान ग़ज़लकार ने विस्तार से लगभग इन सभी पहलुओं को छुआ है। जल प्रदूषण की विभीषिका को रेखांकित करते हुए कुछ शे’र दृष्टव्य हैं -

किस तरह प्यासा नदी के पास जाये बोलिए,

जब वहाँ पर हो रहा है ज़हर घोली का समां

- उपेन्द्र प्रसाद सिंह

*****

नदी जिसका पानी था अमृत के जैसा, न जाने वो विष कौन सा पी रही है।

हरेक सिम्त हैं नागफनियों के मंजर, ये कैसा चमन है, ये कैसी सदी है।

- मिथलेश गहमरी

*****

पीना होगा और गरल, जीना इतना नहीं सरल,

कीचड़ हाथों में भर आता, कहाँ गया वह गंगाजल।

- नवीन निकुंज

वायु प्रदूषण की समस्या मनुष्य के स्वास्थ्य पर निरंतर विपरीत प्रभाव डाल रही है, अब यह तथ्य नया नहीं रह गया है। वर्तमान ग़ज़लकार ने इस समस्या को कुछ इस तरह अभिव्यक्त किया है -

साथ समय के सदा चलो, हर एक तरफ इशारे हैं,

ज़हर हवा में फैल रहा, पेड़-पेड़ पर आरे हैं।

- अशोक गीते

*****

भागदौड़ की एक कहानी चलती है दिनभर

तारकोल की सड़क धूप में जलती है दिनभर

हवा शहर की इसीलिए बीमार हो रही है

मिल की चिमनी काला ज़हर उगलती है दिनभर

- ज़हीर कुरेशी

पर्यावरणविद एवं विचारक श्री विनोद चंद्र पांडेय के अनुसार - “पर्यावरण मानव जीवन का अभिन्न अंग है। मानव पर्यावरण का एक प्रमुख घटक है। मानव के चारों ओर उसे आवृत्त करता हुआ भौतिक जगत का जो परि आवरण है, वही पर्यावरण है। मानव के साथ - साथ विविध प्रकार की वनस्पतियाँ, जीव-जंतु तथा प्राकृतिक संपदा इसमें सम्मिलित है।”

उपर्युक्त परिभाषा पर विचार करें तो यह तथ्य उभर कर सामने आता है कि पर्यावरण की बात करते समय हमें समग्रता के साथ समूचे पारिस्थितिकी तंत्र की चर्चा करनी होगी। वर्तमान ग़ज़ल में पर्यावरण प्रदूषण के समस्त प्रचलित भागों या विषयों पर लिखा गया है। ध्वनि प्रदूषण एवं मृदा प्रदूषण पर केंद्रित कुछ शे’र निम्नवत् हैं -

आदमी बहरा हुआ है शोर से, महफिलों को खा गईं तनहाईयाँ

हैं मशीनी सभ्यता के वन खड़े, अब कहीं गाती नहीं अमराइयाँ

- परमानंद अश्रुज

*****

इन हवाओं में ज़हर है दूर चलिए

ये तो बहरों का शहर है दूर चलिए

शोरगुल के जंगलों में खो गए हम

चिलचिलाती दोपहर है दूर चलिए

- संजीवन मयंक

*****

इस रूमाल को काम में लाओ अपनी आँखें साफ करो

मैला - मैला चाँद नहीं है, धूल जमीं है आँखों में।

- बशीर बद्र

परंपरागत रूप से पर्यावरण प्रदूषण से तात्पर्य जल, ध्वनि एवं वायु प्रदूषण से है। कालांतर में मृदा प्रदूषण भी इस वर्गीकरण में शामिल हुआ। लेकिन प्राकृतिक संसाधनों के अविवेकपूर्ण दोहन के फलस्वरूप हुए पर्यावरण के निरंतर असंतुलन ने विगत कुछ दशकों में इस वर्गीकरण में अम्ल वर्षा, ग्लोबल वार्मिंग या भूमंडलीय तापन, ओजोन परत क्षरण आदि नए विषय भी शामिल हो गए हैं। इन अद्यतन शामिल विषयों या विभीषिकाओं ने तो मानवमात्र के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। वर्तमान समय में विश्वभर के वैज्ञानिक एवं विद्वान आपस में मिलजुलकर इस जीवनदायिनी धरती को बचाने के लिए विचार मंथन कर रहे हैं। अम्ल वर्षा, ग्लोबल वार्मिंग या भूमंडलीय तापन, ओजोन परत क्षरण जैसे आधुनिकतम विषय भी वर्तमान ग़ज़लकार की दृष्टि से ओझल नहीं हुए हैं। इन विषयों की अभिव्यक्ति ग़ज़लकारों के अद्यतन होने तथा इस विषय की गंभीरता को स्पष्ट करती है -

थरथरा रही है जमीं, आसमां है चुप,

इक डर छिपा हुआ है निगाहों में देखिए।

बारिश में भीगने का मौसम नहीं रहा,

तेजाब भर गया है घटाओं में देखिए।

- हरि मौर्य

*****

ओस अब तेजाब की बूदों में ढलकर गिर रही,

फूल से चेहरे हमारे अब कहाँ जाकर खिलें।

- डॉ. उर्मिलेश

*****

कोई पेड़ खिले तो कैसे, फुनगी ही मर जाती है।

धुँआ उगलता ज़हर न तब था, मौसम बड़ा नशीला था।

चली आरियाँ, बाग-बगीचे, खेत बनाया नाती ने

बाबा ने तो अपने हाथों, रोपा पेड़ रसीला था।

- जवाहर इंदू

*****

मत घोलिये आब ओ हवा में रात दिन काला ज़हर

कि साँस भी लेना हो मुश्किल आदमी को साँस भर।

जख्मी हुई जिस रोज़ से ओजोन की मोटी परत

महसूस होती चाँदनी, हो जून की ज्यों दोपहर।

भूकंप-सूखा-बाढ़-रोगों की नई पैदाइशें

हर दिन बढ़ी आती है जानिब गाँव हो या हो शहर।

बनाते रहे मरुस्थल हरे जंगल मुसल्सल काटकर

सोचो जरा होगा हमारा हश्र क्या कुछ है खबर।

रोकी नहीं जो ग़र अभी बढ़ती मशीनीं सभ्यता

इक दिन यकीनन ढ़ाएगी सब पर कयामत का कहर।

बारूद पर बैठा हुआ इंसान जो सभ्हला न तूं

हर तरफ शमशान होंगे या कि कब्रिस्तान भर।

- सत्य नारायण शर्मा

वर्तमान ग़ज़लकार इस प्राकृतिक व्यवस्था के असंतुलन से इतना आहत है कि कहीं-कहीं उनकी ग़ज़लों में निराशावाद की अभिव्यक्ति भी हुयी है –

हर नजर में एक झुलसा गुलमोहर है,

ये हमारे गाँव की ताज़ा खबर है।

- शिव ओम अंबर

*****

कितनों ही के सिर से साया जाता है

जब एक पीपल काट गिराया जाता है।

- ज़फ़र गोरखपुरी

प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुध दोहन से आहत होकर आधुनिक ग़ज़लकार ने सिर्फ निराशावाद में लिपटी ग़ज़लें ही नहीं कही हैं वरन इतना सब कुछ घटने के बाद भी वे भविष्य को लेकर आशावादी हैं। मानव का सहज प्रकृति प्रेम व अनुशासन पूर्ण रवैया ही वह सूत्र है जिसके द्वारा बेहतर भविष्य की कल्पना की जा सकती है। ग़ज़लों में आशावाद को दर्शाते कुछ शे’र -

गुजरो जो बाग से तो दुआ मांगते चले

जिसमें खिले हैं फूल वो डाली हरी रहे।

- निदा फाज़ली

*****

फूल खिल सकते नहीं तो ज़ख्म ही दिल में खिलें

जैसे भी महके ये धरती, इसको महकाना तो है।

- कैफी आज़मी

आज आवश्यकता है उस मानव समाज के निर्माण की, जो प्रकृति के साथ शांतिपूर्ण सह अस्तित्व के सिद्धांत को बनाए रख सके। अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त में कहा गया वाक्य आज के मनुष्य के लिए आदर्श हो सकता है - "हे धरती माँ! जो कुछ तुझसे लूंगा, वह उतना ही होगा जिसे तू पुनः पैदा कर सके। तेरे मर्मस्थल पर, तेरी जीवन शक्ति पर कभी आघात नहीं करूंगा।"

*****

- डॉ. परितोष मालवीय

39/3 डिफेंस कॉलोनी, ग्वालियर

9425735202

संदर्भ -

1. अंक 19, पृथ्वी और पर्यावरण, विनोद चंद्र पांडेय,

2. ग़ज़ल दुश्यंत के बाद, सं. दीक्षित दनकौरी

3. हिंदी ग़ज़ल का वर्तमान दशक, सं. सरदार मुजावर

4. हिन्दी ग़ज़ल शतक, सं. शेरजंग गर्ग

5. हिन्दुस्तानी ग़ज़लें, सं. कमलेश्वर

6. ग़ज़ल विश्वांक, आरंभ - 02, सं. प्रदीप चौबे

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(चित्र - नीरज का शिल्प)

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