बुधवार, 8 जून 2011

अनुज नरवाल रोहतकी की दो सामयिक रचनाएँ

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(1)

दिल्‍ली में बैठे अनशनकारियों पर अत्‍याचार करती है सरकार

फिर भी गांधी के नक्शेकदम पर चलने का दम भरती है सरकार

 

सरकार है अगर पाक-साफ, दाल में अगर कुछ काला नहीं

अन्‍ना हजारे, बाबा रामदेव के अनशन से क्‍यूं सहमी है सरकार

 

माना वे बाबरी-मस्‍जिद के दोषी है तुमने भी दोषी हो 84 के दंगों के

जनता करें है सवाल, जवाब काहे नहीं दे रही है सरकार।

 

वक्‍त रहते देश छोड़ जाओ देश के गद्‌दारों, जनता जाग चुकी है

समझो ,भारत में जनता जब चाहती है तब तक चलती है सरकार।

 

अनशन वास्‍ते संविधान देता है इजाजत, फिर सरकार कौन बीमारी

लोक आवाज जिसने दबाई, उसकी ज्‍यादा नहीं चली है सरकार।

 

गांधी जी के नाम पर वोट लेने वाले झूमे-फरेबी, मक्‍कार सफेदपोश

कहते हैं ‘अनुज' जी, जो कर रही है ठीक कर रही है सरकार

,

(2)

 

अब नहीं जागोगे तो फिर कब जागोगे

लुटिया डूब जाएगी, क्‍या तब जागोगे

 

सरकार लोक आवाज दबाने में लगी है

सरकार खुदको अच्‍छा बताने में लगी है

 

बाबा ठग है - एक कांग्रेसी नेता ने कहा

जेल में क्‍यूं नही डाला, सरकार सो रही थी क्‍या

 

ये पब्‍लिक है सब जानती है, अ नेता बात ये मानो

लाछंन लगाने से पहले अपने गिरहबान में तो झांको

 

हमने सेवा के लिए चुना है सेवक रहो, राजा न बनो

वक्‍त है अब भी औकात में रहना सीखो, ज्‍यादा न उछलो

 

भारत का हर आदमी मिश्र की तरह राजधानी में अगर आ गया

उस दिन कुर्सी तो दूर की बात तुम्‍हें चटाई नसीब नहीं होगी यहां

 

देश की जनता कितने हक में आपके अपनी किस्‍मत आजमालो

अब भी नींद नहीं खुली है तो देश में लोकसभा चुनाव करवालो

 

ऐसा गर हुआ, तुमको तुम्‍हारे घरवालों के वोट भी नसीब नहीं होंगे

बताओ उस दिन शर्म से मरोगे कहां, कहां चुल्लूभर पानी में डूबोगे

 

अभी वक्‍त है बाज आ जाओ अपनी औकात में रहकर सेवा करो

नियत करो साफ पहले जनता का पेट भरो फिर अपना पेट भरो।

--

डॉ.अनुज नरवाल रोहतकी

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ANUJ NARWAL ROHTAKI

--

(चित्र - शिल्पकार नीरज का शिल्प)

4 blogger-facebook:

  1. डा०साहब बहुत सही लिखा है, असर देखिये कब होता है..

    उत्तर देंहटाएं
  2. अच्छी अभिव्यक्ति , बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  3. प्रेम माथुर जी की ईमेल से प्राप्त टिप्पणी -

    बहुत गुस्से में हैं अनुजजी, सही है!
    पर सुधार के लिए राजनेतिक पार्टीबाजी से ऊपर उठाना होगा
    आज सरकार गिरोगे, कल कोई दूसरी आ जाएगी!
    और सब वैसा हचलेगा, पहले भी देख चुके हैं.
    बदलना होगा, ढांचे को, व्यवस्था, को, समाज को, खुद को.
    गाँधी के रास्ते पर चलिए - केवल भूख हड़ताल करना गाँधी का रास्ता नहीं है -
    राजनितिक दांव पेंच से ऊपर उठ कर, आत्मशक्ति से, ईमानदारी से, शांति से,
    अन्ना हजारे की तरह से काम करना होगा.
    बाब रामदेव का दिल साफ़ हो पर, शांत नहीं है, गुस्से से भरे हैं - चुनोतियां दे
    रहे हैं!
    ये काम राजनीती के नेताओं को ही करने दें क्यूँ की वो सत्ता के भूखे हैं! एक
    दूसरे को गिराने की कोशिश करते हैं.
    संतों का काम गिरना नहीं उठाना होता है.
    कोई योग से, हवन से, नारों से, काल धन नहीं सरकारी खजाने में नहीं आ जाने वाला!
    पहले सिपाहियों को ईमानदार बनाइये, तब चोरों को पकड़ने की उम्मीद करिए!
    आज सब चोर हैं! कौन किसको पकड़ेगा?
    गुस्सा मुझे भी आता है - इस पर कि हमारी आत्म-शक्ति कहाँ गयी?
    अगर एक भी पार्टी ईमानदारी से काम करती तो आप हम जैसे उसे आसमान पर बिठा देते!
    प्रेम माथुर

    उत्तर देंहटाएं

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