एस. के. पाण्डेय की बाल कविता - गर्मी

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गर्मी गरमी

गर्मी

(१)

जाड़ा बीता गर्मी आई ।

कम्बल, स्वेटर और रजाई ।।

बक्से में दिया सबने डाल ।

गर्मी ने किया हाल बेहाल ।।

(२)

भट्टी बन गए कमरे सारे ।

आँगन ड्योढ़ी और ओसारे ।।

कूलर, एसी, पंखे चलते ।

बने नहीं अब कहीं निकलते ।।

(३)

धूप में मत तुम बाहर निकलो ।

सुबह-शाम ही खेलो-उछलो ।।

नहीं तो लग जायेगा लूक ।

लपटें देतीं तन को फूँक ।।

(४)

गरम हवा उड़ाती धूल ।

मुरझाईं कलियाँ व फूल ।।

पढ़ना, मत तुम जाना भूल ।

खुलेगा जल्दी फिर स्कूल ।।

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ. प्र.) ।

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1 टिप्पणी "एस. के. पाण्डेय की बाल कविता - गर्मी"

  1. इन्हें अच्छी बाल कविताओं का दर्जा हासिल हो सकता है किसी पाठ्यक्रम में शामिल होने के लायक।

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