विजय वर्मा की हास्य व्यंग्य कविता - आर.एस.वी.पी.

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*R .S V P .[आर .एस.वी .पी .]
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भ्रष्टाचार की है सजी दूकान
सबके निकल रहे अरमान
बेईमानों की यहाँ नहीं कमी
है दुःख कि आपने कुछ नहीं की ?
आर.एस.वी.पी.

साधू घिरा है डाकूयों से
है नाखून काटता चाकूयों से.
उचित कार्यवाई कभी ना की.
किसके पास है इनकी चाबी ?
आर.एस.वी.पी.

सड़क पर तड़प कर मर रिया है.
किस थाने का यह एरिया है?
इसी बात पे अबतक बहस मची.
डरते हो पुलिस से ?बोलो सच्ची.
आर.एस.वी.पी.

कैसे पढ़े अब बुधिया का बेटा?
हर स्कूल है बहुत डोनेशन लेता.
शिक्षा हुई अब बड़ी महँगी.
कौन भरे अब उसका फी ?
आर.एस.वी.पी.

भला कैसे वापस आये काला धन ?
जमा करने में किये थे लाख जतन.
सब तो कह रहें है छी;छी ;छी ;
पर क्या 'इंटेरेस्टेड' है बड़ी बी ?
आर.एस.वी.पी.

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