मंगलवार, 28 जून 2011

संजय दानी की ग़ज़ल - मुहब्बत विरह के धूप में तपती जवानी के सिवा क्या है...

मुहब्बत तेरी मेरी कहानी के सिवा क्या है,
विरह के धूप में तपती जवानी के सिवा क्या है।

तुम्हारी दीद की उम्मीद में बैठा हूं तेरे दर,
तुम्हारे झूठे वादों की गुलामी के सिवा क्या है।

समन्दर ने किनारों की ज़मानत बेवजह क्यूं ली,
इबादत-ए-बला आसमानी के सिवा क्या है।

तेरी ज़ुल्फ़ों के गुलशन में गुले-दिल पीला पड़ जाता,
तेरे मन में सितम की बाग़वानी के सिवा क्या है।

पतंगे-दिल को कोई थामने वाला मिले ना तो,
थकी हारी हवाओं की रवानी के सिवा क्या है।

न इतराओ ज़मीने ज़िन्दगी की इस बुलन्दी पर,
हक़ीक़त में तेरी फ़स्लें, लगानी के सिवा क्या है।

शिकम का तर्क देकर बैठा है परदेश में हमदम,
विदेशों में हवस की पासबानी के सिवा क्या है।

ग़रीबों के सिसकते आंसुओं का मोल दानी अब,
अमीरों के लिये आंखों के पानी के सिवा क्या है।

8 blogger-facebook:

  1. बहुत ही लाजवाब गज़ल है संजय जी की ...आखरी का शेर तो सुभान अल्ला क्या कहने .. बार बार दोहराने का दिल करता है ...

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  2. तुम्हारी दीद की उम्मीद में बैठा हूं तेरे दर,
    तुम्हारे झूठे वादों की गुलामी के सिवा क्या है।

    बहुत बढ़िया....

    उत्तर देंहटाएं
  3. मुहब्बत तेरी मेरी कहानी के सिवा क्या है,
    विरह की धूप में तपती जवानी के सिवा क्या है।

    तेरी ज़ुल्फ़ों के गुलशन में गुले-दिल जर्द पड़ जाता,
    तेरे मन में सितम की बाग़वानी के सिवा क्या है।

    ग़रीबों के सिसकते आंसुओं का मोल दानी अब,
    अमीरों के लिये आंखों के पानी के सिवा क्या है।

    संजय भाई ! ग़ज़ल को बहुत ऊँचाई पर ले आये हो.

    एक दो शेर नहीं ,पूरी ग़ज़ल को बार -बार पढ़ा ,

    कि दिल अभी भरा नहीं.

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  4. दिगंबर नासवा जी और वीना जी का आभार

    उत्तर देंहटाएं
  5. संजय जी ,

    आपकी यह लाजवाब गज़ल है ...
    ग़रीबों के सिसकते आंसुओं का मोल दानी अब,
    अमीरों के लिये आंखों के पानी के सिवा क्या है....
    बहुत ही बढ़िया...

    उत्तर देंहटाएं
  6. ड़ा हरदीप संधु जी का आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  7. मन को सारे सोये हुए तार को झंकृत कर गयी आपकी लाइने
    जवाब नहीं......................

    उत्तर देंहटाएं

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