शनिवार, 18 जून 2011

पुरुषोत्तम व्यास की कविता - तुम भूल गई हो...


तुम भूल गई हो - पुरुषोत्तम व्यास

तुम भूल गई हो-
 
तुम भूल गई हो-
जब-तुमने प्रथम-बार
मेरी कविता पढ़ी
अधरों पर-कंच जैसी मुस्कान-भर
अपने-अधरों को अधरों से दबाकर
मधु-सी मुस्कान भर-कहा कि
तुम बहुत-प्यारी कविता लिखते हो ।
 
मेरा ह्दय-उत्साह-से भर पड़ा था
नव-कल्पनाओं के हिलोरों-मे
झूम पड़ा-था
तुम्हारे अधरों पर कविता
उसी-प्रकार लग रही थी
जैसे सावन मे मेघों की टोली ।
 
तुम भूल गई हो-
पर-अभी-भी स्मरण आती हो
मेरी रचनाओं में
प्रणय सुमन-बन छा जाती हों ।
 
तुम भूल गई हो-
कोकिला का मीठा-सा स्वर सुन
बड़े रोमांचित होते प्रकृति की
उस कृति पर ।
 
तुम भूल गई हो
शीत ऋतु की ठंड-भरी समीर
वह चमकती दिनकर की सुनहरी
सी-आभा-
ह्दय मे चमक उन सुनहरे स्वप्नों की ।
 
तुम भूल गई हो-
खिलखिलाते नव-नव पुष्प
तितलियाँ-अनेक रंग बिखरते हुई
पक्षियों की चहक उड़-रहे नभ में
प्रकृति के आनंद में संग-संग विभोर होते ।
 
पर तुम सब भूल गई हो
पर अभी तुम्हें स्मरण करती मेरी
एक नव रचना
और मेरे प्रणय ह्दय की इतनी-सी
चाह
तुम कह दो-
तुम बहुत प्यारी कविता लिखते हो........।

---

ई-मेल pur_vyas007@yahoo.com

2 blogger-facebook:

  1. आपकी पुरानी नयी यादें यहाँ भी हैं .......कल ज़रा गौर फरमाइए
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  2. कविताएँ ही पढ़वाते रहे उसको!
    --
    इसीलिए भूल गई!

    उत्तर देंहटाएं

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