मंगलवार, 21 जून 2011

दीप्ति परमार की कविताएँ - परिभाषा प्रेम की

दीप्ति परमार

फितरत

चाहत यूं ही  मिल जाये
कीमत नहीं होती
जिन्दगी यूं ही मिल जाये
कीमत नहीं होती ।

जो मिल जाये आसानी से
उसे सम्हालने की
फितरत नहीं होती
उसे संजोये रखने की
नियत नहीं होती ।

चाहत से चाहत न मिले
किस्मत नहीं होती
जिन्दगी को जिन्दगी न मिले
किस्मत नहीं होती ।

जो नहीं मिलता किसी तरह
उसे न पाने की
पीड़ा कम नहीं होती
उसे भूल जाने की
कोशिश कम नहीं होती ।

क्योंकि जो मिल जाता है
कौड़ी हो जाता है
यह मनुष्य की फितरत
परिवर्तित नहीं होती ।

---

परिभाषा प्रेम की

खो रही है संवेदना,सहृदयता,सौम्यता
बदल रही है दुनिया
आधुनिकता के रंग में रंगकर
बदल रही है परिभाषा प्रेम की ।

अब झुरते नहीं प्रेमी विरह में
ढूँढ लेते है कोई नया
क्योंकि
सोच बदल गयी है लैला मजनु की ।

अब प्रेम की गहराई से नहीं
पैसों की फैलाई से मतलब है
अब विश्वास का नहीं
स्वार्थ का रंग गहरा है ।

अब प्रेम
आदर्श नहीं
समर्पण नहीं
व्यापार स्थली और रंगभूमि बन गया है ।

क्योंकि
बदल रही है परिभाषा प्रेम की
मनुष्य की सहूलियत से
दिन, प्रतिदिन प्रतिमानस ।
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डॉ दीप्ति बी परमार , एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी- विभाग
आर आर  पटेल महाविद्यालय , राजकोट

8 blogger-facebook:

  1. आसानी से मिली किसी भी बात की कीमत नहीं होती...
    दोनों रचनाएं बढ़िया...

    उत्तर देंहटाएं
  2. क्योंकि
    बदल रही है परिभाषा प्रेम की
    मनुष्य की सहूलियत से
    दिन, प्रतिदिन प्रतिमानस

    यथार्थ के कितना करीब,
    विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  3. कविता के माध्यम से समसामयिक विषय पर सार्थक अभिव्यक्ति के लिये
    दीप्ति जी को मुबारकबाद।

    उत्तर देंहटाएं
  4. कविताएँ बेजोड़ हैं . आप दोनों को मेरी हार्दिक बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  5. अच्‍छी कविता। सिर्फ प्रेम ही नहीं, तमाम मानवीय रिश्‍तों की परिभाषाएं बदल चुकी हैं, व्‍यक्ति अपनी सुविधा के हिसाब से रिश्‍ते तय करने में लगा है।

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत दिनों के बाद आपकी रचनाएं पढने को मिली । धन्‍यवाद । मानव मन की गहराइयों में झांककर जो सच्‍चाइ आपने बयां की है वह काबिले तारिफ है ।

    उत्तर देंहटाएं
  7. यथार्थ के अत्यन्त करीब कविताएं

    उत्तर देंहटाएं

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