सोमवार, 6 जून 2011

महेन्‍द्र हुमा की दो गजलें - माँ ने नयन सजल भेजे थे, पहुँच गये ना?

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-1-

दुआ भरे आँचल भेजे थे, पहुँच गये ना?

माँ ने नयन सजल भेजे थे, पहुँच गये ना?

 

बहिन ने रस्‍मन बतलाया राखी के धागे

बंधवा लेना, कल भेजे थे , पहुँच गये ना?

 

वक्त ने बेकारी,निर्धनता,जिल्‍लत ख्‍वारी

कर्मों के कुछ फल भेजे थे , पहुँच गये ना?

 

बिना लगाये किसी विरोधी को मत छोड़ो

कीचड़ औ काजल भेजे थे , पहुँच गये ना?

 

जिन प्रश्‍नों से घर की बुनियादें हिलती थीं

उन प्रश्‍नों के हल भेजे थे, पहुँच गये ना?

 

इससे ज्‍यादा और नहीं सामर्थ्‍य ‘हुमा' की

अश्‍क भरे बादल भेजे थे, पहुँच गये ना?

 

-2-

वो कुछ मिलने से पहले छोड़ देगा

बिखरते घर को ऐसे जोड देगा।

 

प्रभावों पर करेगा बात जमकर

मगर कारण अछूते छोड़ देगा।

 

हमीं में से कोई होगा यकीनन

जो बन्‍दिश सरहदों की तोड़ देगा।

 

करेगा कुछ नहीं बातों से लेकिन

जमीं को आसमाँ से जोड़ देगा।

 

वो मेरे पाँव लेकर खुद चलेगा

मुझे बैसाखियों पे छोड़ देगा।

 

न जाने किस तरह वह सोचता है

इरादे बाँध करके तोड़ देगा।

 

‘हुमा' को मत बुलाओ महफिलों में

वो गजलें रोटियों से जोड़ देगा।

---

 

प्रस्‍तुति-डॉ.दिनेश पाठक‘शशि' मथुरा

दिनाँक-05.06.11

4 blogger-facebook:

  1. उम्दा गजल है | बधाई |

    उत्तर देंहटाएं
  2. दुआ भरे आँचल भेजे थे, पहुँच गये ना?

    माँ ने नयन सजल भेजे थे, पहुँच गये ना?

    wah...behatreen ghazal...badhai..

    उत्तर देंहटाएं

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