मंगलवार, 28 जून 2011

मुक्त होती औरत - पुस्तक समीक्षा

मुक्त होती औरत - प्रमोद भार्गव

समीक्षा - कथा संग्रह - मुक्‍त होती औरत -

समकालीनता की दास्‍तान ‘मुक्‍त होती औरत'

समीक्षक - शीना एन. बी.

स्‍वस्‍थ सामाजिक जीवन के निर्माण के लिए सुदृढ़ राष्‍ट्रीय एवं आर्थिक परिस्‍थितियों की तरह स्‍वस्‍थ भावनात्‍मक तत्‍वों की भी अह्‌म भूमिका है। दूसरे शब्‍दों में कह सकते हैं कि भावनात्‍मक अंशों में प्रतिबंध लगाना स्‍वस्‍थ सामाजिकता के खिलाफ है। ऐसी ही एक भावनात्‍मकता है प्रणय। प्रणय हर एक मनुष्‍य का हक है। क्‍योंकि यह एक जैविक जरूरत एवं जिन्‍दगी की तीव्रताओं को अतिक्रमित करने की आत्‍मीयता भी है। यह शरीरबद्ध हो सकता है या नहीं भी हो सकता है। लेकिन एक विकल समाज प्रणय जैसे मूल्‍य को स्‍वीकारने के लिए कभी भी तैयार नहीं है। फलतः प्रणय सदा कपट सदाचार के चाबुक से प्रताड़ित होता है।

‘सदाचार' अधिकार का एक विकृत रूप है। किसी भी मूल्‍य का अस्‍तित्‍व उसे स्‍वीकार नहीं। सवाल यह है कि किस प्रकार ‘सदाचार' प्रणय रूपी मूल्‍य का हनन करता है। ‘सदाचार' प्रणय को अपने विशाल अर्थ एवं संदर्भ में देखने के लिए तैयार नहीं, क्षणिक भोग में सिमटकर दिखाता है। पर शारीरिक मिलन प्रणय का पूर्ण रूप नहीं, बल्‍कि यह तो इसका अंश मात्र है। प्रणय का यह अवमूल्‍यन भावनात्‍मक अराजकता के अलावा कुछ भी नहीं छोड़ता। कहानी संग्रह की ‘सती का सत' कहानी में कनकलता नामक स्‍त्री पात्र ऐसे ही अराजकता का शिकार है। वह जीवन की संध्‍यावेला में पहुंची एक विधवा है। अपनी पैंतालीस उम्र में विधवा बनी कनकलता दूसरा विवाह न करके बच्‍चों की परवरिश में जुट जाती है। अब बच्‍चे सब अपने-अपने भविष्‍य बना चुके हैं। कनकलता अब अकेली रहती है और वह अपनी जिन्‍दगी के नष्‍टप्रायः प्रणय की संभावनाओं के बारे में सोचकर चिंतित है। शारीरिक मिलन की जिस जैविक आवश्‍यकता से वह बरसों से वंचित रही थी, अब उसे तड़फाने लगी है। यौवन की अपेक्षा प्रौढ़ावस्‍था में उपजी उसकी यह चाह शारीरिक जरूर है, पर वह मात्र शारीरिक भी नहीं है। शारीरिक मिलन के जरिए वह अपनापन के उस क्षण को पाना चाहती है, जहां पहुंच कर वह अपने जीवन भर के तनाव, अकेलापन और थकान को दूर कर सके। प्रणय की यह भावनात्‍मक तृष्‍ति हर एक स्‍त्री का हक है। लेकिन अफसोस की बात यह है कि स्‍त्री का यह नष्‍टप्रायः हक किसी ‘प्रगतिशील सामाजिक सोच' को परेशान नहीं करता। परिणामतः स्‍त्री समाज के प्रति अपने संपूर्ण कर्त्तव्‍यपालन के बाद भी आंतरिक तौर पर निर्जीव महसूस करती है।

प्रणयविहीन अवस्‍था से जन्‍मी स्‍त्री की आंतरिक निर्जीवता, कई आर्थिक एवं सामाजिक कारणों से भी प्रबल बनती है। ‘किरायेदारिन' कहानी की विधवा भी इन्‍हीं आर्थिक एवं सामाजिक कारकों से बार-बार प्रताड़ित होती है। तब वह किसी मर्द से पुनः विवाह करने की इच्‍छा प्रकट करती है। यहां प्रणय का अतिजीवन पक्ष उजागर होता है। प्रणय के सुरक्षा कवच में जीने की इच्‍छा प्रकट करने वाले स्‍त्री पात्र को उसके चरित्र विकास के संदर्भ में लेखक ने उसे ‘मर्द औरत' तो जरूर कहा है। पर उसकी इस इच्‍छा के पीछे तो मर्दानापन कम और स्‍त्रीत्‍व ज्‍यादा है। क्‍योंकि जिंदगी की कठोरता के बीच में भी वह कोमल पक्षों का मूल्‍य बखूबी समझती है। स्‍त्रीत्‍व की यह समझ ‘मुक्‍त होती औरत' की मुक्‍ता में भी देख सकते हैं। फलतः वह आध्‍यात्‍मिकता के चोले को उतारकर, स्‍थित सदाचार को कपट घोषित करके, हिम्‍मत के साथ प्रणय की आत्‍मीयता में तल्‍लीन होती है। यहां आध्‍यात्‍मिकता की अपेक्षा प्रणय जैसे मूल्‍य का चुनाव एक क्रांति है। क्‍योंकि प्रणय की संभावनाओं की अवहेलना करके एक परिष्‍कृत समाज की निर्मिति संभव नहीं है।

इस संग्रह में जनतांत्रिक गतिविधियों की परख करने वाली कई कहानियां हैं। यहां जनतंत्र से तात्‍पर्य सिर्फ बहुमत की गिनती से नहीं है। जनतंत्र एक संस्‍कृति है, लेकिन आज जनतंत्र का यह सांस्‍कृतिक पक्ष विलुप्‍त होता जा रहा है। क्‍योंकि जनतंत्र व्‍यवस्‍था में सबसे अधिक उपेक्षा जिनकी होती है वह है, जनता बनाम आम-आदमी की। फिर भी आम-आदमी की बुनियादी जरूरतों की पूर्ति सारे वर्चस्‍ववादियों की आइडियोलजी है। यह वर्चस्‍ववादियों को एक समाजवादी छवि प्रदान करती है। आइडियोलजी का यह अपहरण बिल्‍कुल एक गंभीर समस्‍या है। समाजवाद के छद्‌म छवि रखने वाले कई स्‍वार्थी एवं वर्चस्‍वलोलुप लोग कभी क्रांति के नाम पर और कभी आतंकवाद के दबाव के नाम पर आपस में मुठ-भिड़ते हैं। दुर्भाग्‍य की बात है कि इस मुठ-भेड़ का सबसे बड़ा शिकार वह आदमी हैं, जिनका इन मुठ भेडों से किसी प्रकार का संबंध ही नहीं है। ‘मुखबिर' कहानी इस यथार्थ का खुलासा है। इसमें गंगाराम गड़रिया नामक गरीब आदमी सत्ताधारियों एवं डकैतों के बीच में पड़ जाता है। उसके सामने उन लोगों की तरह कोई सैद्धांतिक समस्‍या नहीं है। उसकी सिर्फ एक ही समस्‍या है, वह है भूख। यह वह भूख है, जो उसे इन दोनों के बीच ले जाती है। लेकिन उसकी यह भूख न डकैतों की समस्‍या, है न अधिकारियों की। लेकिन दोनों लड़ते हैं, उन जैसों के नाम। कहानी के अंत में गंगाराम अधिकारियों एवं डकैतों के बीच होने वाले एक शर्मनाक समझौते का साक्षी बनता है। यह समझौता वास्‍तव में आम-आदमी के अस्‍तित्‍व को मिटाने का षड्‌यंत्र ही है। इससे यह स्‍पष्‍ट जाहिर होता है कि जनता के नाम पर जो लोग यहां स्‍थित हैं, वे लोग वास्‍तव में जनता के खिलाफ हैं।

जनतंत्र का मूल्‍यांकन उसकी उदार नीतियों के संदर्भ में भी करना जरूरी है। महिला आरक्षण विधेयक की चर्चा इस संदर्भ में परिणति है। लेकिन एक उदार जनतांत्रिक दृष्‍टिकोण की परिणति है। लेकिन इस उदार कानून के बावजूद भी

स्‍त्रियों को राजनीतिक सहभागिता का हक मिलने की बात संदिग्‍ध है। जिन लोगों को अधिकार की आदत पड़, गयी है वे लोग कभी भी इसे छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं। वे लोग ऐसी स्‍त्रियों को टिकट देंगे, जो या तो उनके सगे-संबंधी हैं या उन्‍हें, जिसे वर्चस्‍ववादियों की गुलामी करने के अलावा किसी से कोई सरोकार ही नहीं है। ‘जूली' कहानी की जूली नामक आदिवासी महिला चुनाव तो जीत लेती है, पर वह जनतंत्र की प्रतिबद्धताओं से वंचित है। उसके लिए मालिकों का आज्ञा पालन ही सबसे बड़ा धर्म है। यहां जन-प्रतिनिधि वर्चस्‍व का प्रतिनिधि बन गया है। जनतांत्रिक व्‍यवस्‍था में जन-प्रतिनिधित्‍व की बात वास्‍तव में एक छल है। यहां वह व्‍यक्‍ति ही जन-प्रतिनिधि बन सकता है, जो वर्चस्‍व का प्रतिनिधि बनने के लिए तैयार है। अन्‍यथा उसे किसी भी पार्टी का टिकट मिलना तक मुश्‍किल है। ‘कहानी विधायक विद्याधर शर्मा की' शीर्षक कहानी भी इसी विषय पर केंद्रित है। ये कहानियां व्‍यक्‍त करती हैं कि स्‍थित जनतंत्र व्‍यवस्‍था बाहरी तौर पर ही उदार है। यहां जनतंत्र के सांस्‍कृतिक पक्ष की निरंतर अवहेलना होती रहती है। ऐसा जनतंत्र बेशक एक अपसंस्‍कृति है।

विकल जनतंत्र व्‍यवस्‍था का सह-उत्‍पाद है, पूंजीवाद ! पूंजीवाद का बदलता स्‍वरूप समकालीन कहानी का विषय है। ‘गंगा बाटाईदार' कहानी इस पर केंद्रित है। इसमें पूंजीवाद कहीं भी किसी के प्रति कठोर नहीं है। सभी के प्रति वह ‘उदार' है। अपनी ‘उदारता' से वह किसानों को झूठे सपने दिखाता है। इसके लिए वह जैविक संभावनाओं तक को भी व्‍यापार तंत्र का हिस्‍सा बना देता है। इस गूढ़ तंत्र का परिणाम है किसान का अपने खेत से बरखास्‍त होना, पर सरकार तो अब भी खेती के लिए तरह-तरह की उदार नीतियां बना रही है। तरह-तरह की सब्‍सिडियां दे रही है। जब ज्‍यादातर किसान अपने खेत से भगा दिया गया है तो ऐसी नीतियों का क्‍या फायदा ? सवाल यह भी है कि आखिर यथार्थ से आंख मूंदकर नीतियां किसके लिए बनायी जा रही हैं।

पूंजीवाद का अस्‍तित्‍व आज जितना प्रत्‍यक्ष है, उतना ही अप्रत्‍यक्ष भी है। आज पूंजीवाद हर एक व्‍यक्‍ति के मन मस्‍तिष्‍क में विद्यामान है। फलतः व्‍यक्‍ति सिर्फ एक ही पैमाने से सभी स्‍थितियों को आंकता है, वह है लाभ। ‘पिता का मरना' कहानी में पिता एक सरकारी कर्मचारी हैं। अब वह बीमार होकर अस्‍पताल में लेटा हुआ है। लाइलाज अवस्‍था में पहुंच चुके उसके इलाज पर अब और पैसा खर्च करना फिजूलखर्ची जताकर उसकी पत्‍नी और बेटे उसे ग्‍वालियर अथवा दिल्‍ली ले जाने से इनकार कर देते हैं। वे सोचते हैं कि पिता के मरने पर बेटे को अनुकम्‍पा नियुक्‍ति मिल जाएगी। बीमा, भविष्‍यनिधि और ग्रेच्‍युटी से बेटी का ब्‍याह ढंग से संपन्‍न हो जाएगा। प्रस्‍तुत कहानी में पिता के मरने के पहले ही एक और मौत हुई है, वह है परिवार वालों की संवेदना की। यह मौत अत्‍यंत खतरनाक है।

संवेदन शून्‍य आदमी यंत्रों के समान है। यंत्र हमेशा सूचनाओं से संचालित हैं। भावनाओं और अनुभवों की दुनिया से उसका कोई संबंध ही नहीं है। आदमी जब यंत्र बनाता है तो वह संस्‍कृति के आधार बने इन तबकों से कोसों दूर चला जाता है। तब सारे रिश्‍ते-नाते उसके लिए अनुभव न बनकर, निभाने की औपचारिकता मात्र बनकर रह जाते हैं। तब वह ‘परखनली का आदमी' मौत की खबर सुनकर, भावना शून्‍य होकर कंप्‍यूटर में ऐसा शोक-संदेश प्रेषित कर सकता है कि आकस्‍मिक मृत्‍यु पर मुझे बेहद दुःख हुआ। ईश्‍वर उनकी आत्‍मा को शांति प्रदान करे। मेरी ओर से विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित।''

पूंजीवादी स्‍थितियों की विकरालता का आकलन करना मात्र समकालीन कहानी का उद्‌देश्‍य नहीं है। इन स्‍थितियों का प्रतिरोध लेखन का उद्‌देश्‍य है। ‘इंतजार करती मां कहानी की आयुषी बहुत ही महत्‍वाकांक्षी है। अपनी काबिलियत से वह उपलब्‍धियों की कई सीढ़ियां चढ़ती गयी। लेकिन जब उसे यह पता चलता है कि ‘नो सेक्‍स सिंड्रोम' की वह गिरफ्‍त में वह आ गई है और इस कारण से वह मां नहीं बन सकती है, तो वह सारी महत्‍वाकांक्षाएं एवं उससे मिलने वाली उपलब्‍धियों को छोड़ने के लिए तैयार हो जाती है। यहां कहानी यह घोतित करती है कि जिन्‍हें हम उपलब्‍धियां कहते हैं, वे वास्‍तव में उपलब्‍धियां हैं ही नहीं। क्‍योंकि इनका आधार सिर्फ आर्थिक है, मानवीय नहीं।

प्रमोद भार्गव की कहानियों में व्‍यक्‍ति की आंतरिक अनुभूतियों को अतिसूक्ष्‍म धरातल पर उतारा है। ये आंतरिक अनुभूतियां सामाजिक अंतर्विरोधों की तीक्ष्‍णताओं को दर्शाने का उपक्रम हैं। वैयक्‍तिक एवं सामाजिक संतुलितावस्‍था की मांग इन कहानियों का लक्ष्‍य है।

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Keral-680613

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टीप - संपूर्ण कहानी संग्रह आप रचनाकार के जनवरी 2011 के पृष्ठों में पढ़ सकते हैं.

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