बुधवार, 29 जून 2011

पुरुषोत्तम व्यास की कविता - अपनी कविता पढ़कर

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अपनी कविता पढ़कर

 

अपनी कविता पढ़कर

उसे याद करता

भूली भूली  सी याद को

फिर आंखों भरता हूँ

खड़ी है

अब भी वही

देख रही है मुझ को

ह्दय हर कोने में उसको ही पाता हूँ

शब्द होते नदी नदी

शब्द होते सागर सागर

प्यार ही प्यार  से दूर हो जाता ।

 

मेरे कमरे मै तितली आई

 

मेरे कमरे मै तितली आई

मन में खुशियां भर लाई

चहक गया सारा संसार

पंख फैलाये वह आई  ।

 

नयन- सुंदर-सें

मृग के नयन - फीके थे

बात – बात- मुस्कुराती

जीवन मे चाह जगाती ।

 

हर चीज मुझे - सुहाती

तुम ही मेरे हो-

कहते – कहते  रूक सी जाती

मेरे कमरे मै तितली आई ।

 

यह उसका प्यार मुझे प्यारा

लगता-

आवाज देने पर चुप - सा रहता

मेरे कमरे मै तितली आई ।

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