सोमवार, 13 जून 2011

अजय कुमार तिवारी की दो कविताएँ - आतंक और इंतजार

aatank intejar

आतंक

यामिनी के गहन निविड़ में

या घने कोहरे से भरी सुबह को

जब वीरान हो हर राह

हाथ को हाथ न दिखाई न दे

शासन, हत्‍यारे, अदालतों के खौफ से रहित

रचना चाहता हूँ मैं

आतंक में आकंठ डूबा हुआ एक इतिहास

विलाप भरा साम्राज्‍य

 

बुनना चाहता हूँ मैं

भयानक संगीत का ताना बाना

तोड़ता हुआ निकल जाए जो

तार सप्‍तक के उच्‍चतम स्‍वर को

पर जिसे सुन न सके कोई

किंतु भयग्रस्‍त हूँ फिर भी

कोई क्षुधातुर दस्‍यु उस अंधकार में

प्रकट होकर अनायास

छीन न ले मेरे स्‍वप्‍नातुर मन के

उस अरमान को

चढा न दे मर्सीडीज कोई धनांध

उस फुटपाथ पर

जिसपर अपना सामान रखना चाहता हूँ

---

इंतजार

खड़ा हूँ हजारों बरस से
उसी स्‍टेशन पर
जो जंक्‍शन है बड़ा
आती हैं गाड़ियाँ जहाँ हर आधे मिनट में
पर सिर्फ आधे मिनट के लिए

जाना चाहता हूँ बहुत दूर
पर भीड़ से लैस उन गाड़ियों में
जो हैं सिर्फ एक्‍सप्रेस, सुपरफास्‍ट या मेल या राजधानी
एक भी बोगी नहीं जिसपर
बोर्ड लगा हो, द्वितीय या साधारण दर्जे का
लोग बताते हैं
सिर्फ हैं टू टियर, थ्री टीयर, चेयर कार, शयनयान
या हैं भी एकाध
चढ़ नहीं पाता उसमें
मैं दुबला-पतला, असहाय, निरीह,
साधारण, अनपढ़, ग्रामीण भारत का

गिर जाता हूँ धक्‍के खाकर
फिर यहीं प्‍लेटफार्म पर
यात्रियों के बैठने के स्‍थान के नीचे
क्‍योंकि यात्री नहीं माना जाता अब मुझे
इतने दिनों के इंतजार के बाद
पर पड़ा हूँ आज भी
आस में
अपने टाइप दर्जे वाली रेल के डिब्‍बे की

--

ajay kumar tiwary;

b-14dav colony,jarhi,

bhatgaon,surguja,chhattisgarh

--

(चित्र - ज्ञानेन्द्र टहनगुरिया का रेखांकन)

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