गुरुवार, 30 जून 2011

प्रमोद भार्गव का आलेख - लड़की को लड़का बनाने की चाहत

लड़की को लड़का बनाने की चाहत

पितृसत्तात्‍मक मानसिकता और जीव वैज्ञानिक रूढ़िवाद हमारे देश के जन-मानस में कितनी गहरी पैठ बनाए हुए है, इसका पता लिंग परिवर्तन के लिए की जा रही उन शल्‍य क्रियाओं से चलता है, इनके जरिए लड़की को लड़का बनाया जा रहा है। समाज में बेटे की उग्र चाहत के चलते अभी तक हम कोख में ही गर्भ जल परीक्षण प्रणाली (अल्‍ट्रा साउण्‍ड) के जरिए कन्‍या भू्रण की पहचान कर उसे कोख में ही मार डालने के वीभत्‍स कारनामों से परिचित थे, लेकिन अब इस प्रणाली की

अगली कड़ी ‘जेनिटोप्‍लास्‍टी' तकनीक जन्‍म ले चुकी है। इसके मार्फत मासूम बालिकाओं का वजूद खतरे में पड़ गया है। हाल ही में एक अंग्रेजी दैनिक ने पर्दाफाश किया है कि मध्‍यप्रदेश के इन्‍दौर में एक से पांच वर्ष तक की अबोध बालिकाओं का लिंग परिवर्तन कर उनका बालकों के रूप में कायांतरण कर अमानवीय कृत्‍य किया जा रहा है। अब तक सैंकड़ों बालिकाएं इस कायांतरण की प्रक्रिया से गुजर चुकी हैं। इस सिलसिले में चिकित्‍सकों की दलील तो यह है कि जिनका लिंग परिवर्तन किया गया है, वे बच्‍चे न तो पूर्ण स्‍त्री होते हैं और न ही पूर्ण पुरूष। मसलन ये हिजड़ों की नस्‍ल के होते हैं। लेकिन यह झूठ लालची चिकित्‍सकों द्वारा किए जा रहे पाप पर पर्दा डालने की कोशिश भर है। हकीकत तो यह है कि सामान्‍य बालिकाओं का ही लिंग परिवर्तन कर उन्‍हें बालकों के रूप में तब्‍दील किया जा रहा है। किसी लड़के को लड़की बनाए जाने की जानकारी सामने नहीं आई है।

पुत्र की चाहत ने जहां हमारे समाज को अंध विश्‍वासी बनाने का काम किया है, वहीं इस बीमार मानसिकता का दोहन हमारे लालची और जाहिल चिकित्‍सक धन-लिप्‍सा के चलते कर रहे हैं। लिंग परिवर्तन की इस प्रक्रिया में बहाना तो यह बनाया जा रहा है कि चिकित्‍सक केवल उन बच्‍चों को जीवनदान दे रहे हैं जो जन्‍मजात अधूरे जननांग लेकर पैदा हुए हैं। मसलन वे न पूर्ण बालक हैं और न ही बालिका। इसे ठीक से समझने के लिए यूं भी परिभाषित कर सकते हैं कि ऐसे बच्‍चे जिनके बाहरी जननांग तो स्‍त्रियों के हैं, लेकिन दुर्भाग्‍य से अंदरूनी पुरूषों के हैं। लिहाजा इंटरसेक्‍स या हिजड़ों का अभिशाप ये बच्‍चे क्‍यों भोगें, इसलिए वे इन्‍हें चिकित्‍सीय तकनीक के जरिए एक संपूर्ण व्‍यक्‍तित्‍व देकर अपंग मानव जाति के लिए पुण्‍य का काम कर रहे हैं। यह दलील इसलिए बेवुनियाद है क्‍योंकि अब तक जितनी भी जानकारियां उजागर हुई हैं, उनके जरिए लड़कियों को लड़कों में रूपांतरित किया गया है। ठीक वैसे ही, जैसे कि गर्भ में लिंग की पहचान के बाद लड़की को मार दिया जाता है। हालांकि ये रूपांतरित बालक भी वयस्‍क होने पर संतान पैदा करने में सक्षम नहीं होंगे, इसके बावजूद इन्‍हें अभिभावक कालांतर में वंश वृद्धि का जरिया मानकर चल रहे हैं।

अब तक इस प्रणाली का प्रचलन थाईलैण्‍ड, मलेशिया और सिंगापुर में था। इन देशों में हमारे देश के धनाढ्‌य लोग पुत्र की चाह में अभी भी जाते हैं। जिससे की वे जेनिटोप्‍लास्‍टी तकनीक के जरिए चिकित्‍सालय में ही गर्भाधान कराकर लड़की को लड़के के रूप में तब्‍दील कराकर स्‍वदेश लौट आएं। और किसी को खबर भी न लगे कि उन्‍होंने पुत्री को पुत्र में तब्‍दील होने का घिनौना कृत्‍य किया है। लेकिन अब इन्‍दौर के चिकित्‍सक ही लिंग परिवर्तन की इस अनूठी पद्धाति में पारंगम हो गए हैं। ये पश्‍चिमी देशों से प्रशिक्षित होने का दावा भी करते हैं। हकीकत में जिन नवजात बच्‍चियों का लिंग परिवर्तन किया जा रहा है, जरूरी नहीं कि वे अधूरा व्‍यक्‍तित्‍व लेकर पैदा हुई हो ? दरअसल खुद माता-पिता पुत्र मोह में स्‍वस्‍थ और संपूर्ण स्‍त्री का लिंग परिवर्तन कराने में जुटे हैं। उपचार के लिए लाई गई ऐसी बच्‍चियों के शरीर में पहले कुछ हारमोन डाले जाते हैं, जिससे विपरीत लिंगी अंग और लक्षणों का उभार शरीर में दिखाई देने लगे। फिर ऑपरेशन के जरिए लड़की का लड़के में कायांतरण कर दिया जाता है। हालांकि चिकित्‍सा विज्ञान का मानना है कि ये पुरूष संतान तो पैदा नहीं कर पाएंगे, लेकिन नपुंसक भी नहीं होंगे। यह दलील ऐसे अभिभावकों के लिए एक चेतावनी भी है जो वंश वेल जारी रखने के नजरिए से लिंग परिवर्तन करा रहे हैं। इस ऑपरेशन में महज डेढ़ से दो लाख रूपए खर्च आता है। कन्‍या के प्रति यह नजरिया रखने वाले माता-पिता के लिए यह कोई बड़ी धन राशि नहीं है। यही वजह है कि इन्‍दौर में दिल्‍ली, मुंबई और कोलकाता से पुत्र प्रेमी दंपतियों का तांता लगा है।

ये हालात पुरूष की तुलना में स्‍त्रियों की संख्‍या घटाने में बड़ा कारण बनने जा रहे हैं। करीब तीन माह पहले आए जनगणना के आंकड़ों में बच्‍चा-बच्‍ची का अनुपात बिगड़ने की स्‍थिति सामने आने पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कन्‍या भू्रण हत्‍या को राष्‍ट्रीय शर्म माना था। एक तरफ देश में महिलाएं कामयाबी के लगातार मील के पत्‍थर गाड़ रही हैं, वहीं उन्‍हें अवांक्षित मानकर हत्‍या की जा रही है। राजनीति में महिलाओं का जबरदस्‍त दखल उभरकर सामने आने के बावजूद भारतीय समाज अभी भी स्‍त्रीजन्‍य पुरातन मानसिकता और पूर्व ग्रहों में जकड़ा हुआ है। देश में जो तबका सबसे ज्‍यादा उच्‍च शिक्षित, उच्‍च पदस्‍थ व संपन्‍न है, इसी तबके के बीस फीसदी परिवारों में कन्‍या भू्रण हत्‍या जारी है। नतीजतन नई जनगणना के मुताबिक उच्‍च तबकों में प्रति हजार पुरूषों पर 750 स्‍त्रियों का अनुपात सिमटकर रह गया है। जबकि जिस तबके को हम पिछड़ा, अशिक्षित, वंचित और तमाम रूढ़ि और जड़ताओं का जिम्‍मेबार मानने का मुगालता पाले हुए हैं, उनके बीच बालिकाओं में आशातीत वृद्धि दर्ज की गई है। इसी विसंगति के चलते हरियाणा और पंजाब जैसे समृद्धशाली प्रदेशों में तो ये हालात पैदा हो गए हैं कि यहां के लड़कों को दुल्‍हिनें नहीं मिल रहीं, लिहाजा इनकी पूर्ति ओड़ीसा और छत्तीसगढ़ के पिछडे़ माने जाने वाले क्षेत्रों से लड़कियां खरीदकर वधुओं के रूप में लाई जा रही हैं।

जेनिटोप्‍लास्‍टी एक नई तकनीक है इसलिए अभी इसे प्रतिबंधित करने संबंधी कोई स्‍पष्‍ट कानून नहीं है। अल्‍ट्रासाउण्‍ड परीक्षण की तरह प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम 1994 (पीएनडीटी एक्‍ट) की तरह इस बावत भी कड़े कानूनी प्रावधान बनाया जाना जरूरी है। इसके बावजूद यह एक अच्‍छी बात है कि इन्‍दौर की इस घटना का अखबार में खुलासे के तत्‍काल बाद ‘राष्‍ट्रीय बाल संरक्षण एवं अधिकार आयोग (एनसीपीसीआर) ने इसे संज्ञान में लेकर प्रदेश सरकार को जांच के निर्देश दिए हैं।

आधुनिक चिकित्‍सा तकनीक तथा सूचना और प्रौद्योगिकी का जैसे-जैसे इजाफा हो रहा है, वैसे-वैसे स्‍त्री जाति के अस्‍तित्‍व पर खतरा मंडराता जा रहा है। इंटरनेट ने जहां दुनिया को बहुत छोटा कर दिया है, वहीं इसके चौंकाने वाले खतरे भी कम नहीं हैं। इंटरनेट पर ‘चूज द सेक्‍स ऑफ योर बेबी डाट कॉम', ‘4' जेंडर सलेक्‍शन डाट कॉम और ‘प्रेग्‍नेंसी स्‍टोर डाट कॉम' जैसे वेब ठिकानों पर गर्भस्‍थ शिशु के लिंग परीक्षण संबंधी सेवाएं और सामग्री हासिल हैं। इन साइटों पर पेश किए गए लिंग निर्धारण किट खरीदकर के घर पर ही डीएनए विश्‍लेषण के माध्‍यम से भू्रण लिंग बताने में मदद करते हैं। इन कंपनियों के विज्ञापन लगातार जारी है। एक वेबसाइड पर पेश विज्ञापन में किट का नाम ‘बेबी जेंडर मेटर होम डीएनए टेस्‍ट किट' है। अमेरिका और कनाडा में ऐसे किट्‌स की कीमत 15 से 20 हजार रूपए है।

ऐसी आसान सुविधाओं के चलते ही चिकित्‍सा जगत की अंतरराष्‍ट्रीय पत्रिका ‘लैंसेट' ने अपने एक अध्‍ययन के जरिए बताया है कि भारत में पिछले तीन दशक के दौरान एक करोड़ 21 लाख कन्‍याओं को गर्भ में ही मार डाला गया। कानूनों के अमल में ढिलाई और प्रशासनिक भ्रष्‍टता के चलते हम इस तथ्‍य को एकाएक झुठला भी नहीं सकते। इन हालातों से यह जाहिर होता है कि पुत्र मोह से जुड़ी मानसिकता जहां पितृसत्तात्‍मक रूढ़ियों को संजीवनी दे रही हैं, वहीं वैज्ञानिक तकनीक की आसान उपलब्‍धता इसे अभिशाप में बदलने का काम कर रही है। लिहाजा कन्‍या भू्रण हत्‍या और लिंग परिवर्तन जैसे कारनामों को हर स्‍तर पर प्रतिबंधित करना तो जरूरी है ही, मां को भी अपनी ही कोख से पैदा होने वाली बच्‍ची की रक्षा के लिए आवाज बुलंद करनी जरूरी है, अन्‍यथा बेटियों को परिवार व समाज में वाजिब हक व जगह मिलना मुश्‍किल ही है।

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pramod.bhargava15@gmail.com

प्रमोद भार्गव

शब्‍दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी म.प्र.

लेखक प्रिंट और इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्‍ठ पत्रकार है ।

1 blogger-facebook:

  1. सार्थक आलेख के लियें सर्वप्रथम आपको बधाई...

    gita-pandit.blogspot.com\ 'हम और हमारी लेखनी '
    स्त्री विमर्श के लियें बनाया गया है मैं ये आलेख उस ब्लॉग पर पोस्ट करना चाहती हूँ..

    साभार
    गीता पंडित

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