संजय दानी की ग़ज़ल - बच्चों की ख़ुशियों के खातिर, बाप को मरना पड़ा है...

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सुख का दरवाज़ा खुला है,
ग़म प्रतीक्षा कर रहा है।

सुर्ख हैं फूलों के चेहरे,
रंग कांटों का हरा है।

रात की बाहों में अब तक,
दिन का सूरज सो गया है।

जीतना है झूठ को गर,
सच से रिश्ता क्यूं रखा है।

इश्क़ के जंगल में फिर इक,
दिल का राही फंस चुका है।

बन्दगी उनकी हवस की,
सब्र क्यूं मेरा ख़ुदा है।

जब सियासत बहरों की क्यूं ,
तोपों का माथा चढ़ा है।

बच्चों की ख़ुशियों के खातिर,
बाप को मरना पड़ा है।

इश्क़ के सीने पे अब भी,
हुस्न का जूता रखा है।

मुल्क में पैसा तो है पर,
हिर्स का ताला लगा है। ( हिर्स-- लालच)

ज़ुल्म के दरिया से दानी,
दीन का साहिल बड़ा है।
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7 टिप्पणियाँ "संजय दानी की ग़ज़ल - बच्चों की ख़ुशियों के खातिर, बाप को मरना पड़ा है..."

  1. बहुत सुन्दर भावपूर्ण अभिव्यक्ति| धन्यवाद|

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  2. दानी साहब ने आज के युग के आदमी की फितरत को आईना दिखाया है.

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  3. शानदार गजल, बधाई.

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  4. भारतीय- नागरीक के मुखिया का आभार।

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  5. बेनामी1:26 pm

    BAHUT HI KHUBSURAT RACHNA HAI. AAJ KE SAMAY KO PARDARSHIT KAR RAHA HAI.

    उत्तर देंहटाएं

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