रविवार, 5 जून 2011

हिमकर श्याम की पर्यावरण दिवस विशेष कविता - नदी

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पर्यावरण दिवस विशेष

नदी

(एक)

शहर की बेचैन भीड़ में

गुम हो गयी है वो नदी

जो सदियों से बहती थी

यहां के वन-प्रांतरों में

यहां के परिवेश में

सिखाती थी अनुशासन

बांटा करती थी संस्‍कार।

 

नदी जो साक्षी रही है

हर्ष-विषाद, सुख-दुख,

संघर्षों और विकास की

समृद्धि और ऐश्‍वर्य की

खड़ी है आज अकेली

निस्‍तब्‍ध और उदास

बेबस ओर लाचार।

 

वरदान थी शहर की

वाशिंदों की खातिर

आंचल में लाती थी

सींप, शंख और रेत

रंग-बिरंगी मछलियां

बांहों में भर के प्‍यार।

 

बेच रहे हैं नदी को

सैकड़ों गिरोहबंद

दलाल और ठेकेदार

बेच रहे हैं सपने

फैला रहे हैं भ्रमजाल

समृद्धि का कारोबार।

 

भूल गये हैं लोग

नदी से अपने रिश्‍ते

जिसके किनारों पर

मिलता था मोक्ष

बांटा करती थी जो नदी

छोटी-छोटी परेशानियां

क्षणभंगुर लालसाओं की

बन गयी है शिकार।

 

जहां जिसने भी चाहा

नदी के सीने पर

बना लिया आशियां

खटाल और तबेला

उड़ेलने लगे गंदगी

प्रदूषण व अतिक्रमण से

छीन ली गयी पवित्रता

मिलने लगा तिरस्‍कार।

 

जीवित है नदी इस आशा में

लौटेंगे वे लोग किनारों पे

भूल बैठे हैं जो नदी से रिश्‍ते

छोड़ गये है उसे अकेले

रूकेंगे वे हुक्‍मरान भी जो

गुजरते हैं उसके ऊपर से

लाल बत्‍तीवाली गाड़ियों में

देखेंगे उसकी दुर्दशा

लौटेगी फिर उसकी धार।

 

नदी

(दो)

चमकीली बस्‍तियों की

कोलाहल और भीड़ में

खो गयी है जो नदी

हो रही है उसकी तलाश

नदी जो बहती थी

यहां युगों-युगों से

कभी थी जीवन-रेखा

कोलाहल और भीड़ में

खो चुकी थी पहचान

खो चुकी थी अहमियत।

 

अनजानी लालसाओं

बेचैन सपनों के पीछे

भूल गये थे जो लोग

नदी से अपने रिश्‍ते

किनारों से अपना नाता

समझने लगे हैं वे

नदी की सार्थकता

जागने लगी है

उनकी सोयी चेतना

ढ़ूंढ रहे हैं वे नदी को।

 

लौटेगी फिर नदी की धार

लौटेगी खोयी पवित्रता

होगा अब पुनरू़द्धार

मापी जाएगी सीमा

हटेगा अतिक्रमण

होने लगी है बहस

बनने लगा है कारवां।

---

 

हिमकर श्‍याम

द्वारा ः एन. पी. श्रीवास्‍तव

5, टैगोर हिल रोड, मोराबादी,

रांचीः 8, झारखंड।

--

(चित्र - अमृतलाल वेगड़ का कोलाज)

7 blogger-facebook:

  1. मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति, बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  2. नदी और वन न रहे तो हम भी न बचेंगे..

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (6-6-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  4. सिखाती थी अनुशासन

    बांटा करती थी संस्‍कार।

    बहुत सुंदर भाव से आपने ये कविता लिखी है .....सोच का विषय तो है ही ..!!
    http://anupamassukrity.blogspot.com/2011/06/blog-post.html
    "badi hi kathin hai dagar panghat ki "padhiyega .....!!
    aisi soch aur lekhan ke liye badhai.

    उत्तर देंहटाएं
  5. nadi ke dard ko batati hui bahut achche bhaav liye saarthak rachanaa.badhaai sweekaren,



    please visit my blog.thanks

    उत्तर देंहटाएं
  6. this really another one of your creations in.

    लौटेगी फिर नदी की धार

    लौटेगी खोयी पवित्रता...

    i liked the most. hope in life. good one bhaiya.
    congratulations.

    उत्तर देंहटाएं
  7. मेरी रचनाओं को पसंद करने के लिए आप सबों का हार्दिक आभार.

    आपका स्नेह और प्रोत्साहन ही मुझे और लिखने के लिए प्रेरित करता है.

    उत्तर देंहटाएं

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