शुक्रवार, 3 जून 2011

गोकुल खिडिया के कुछ लोकगीत

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         धूम धाम सा


धूम धाम सा ............... , सरे आम सा ...........
धूम धाम सा ............... , सरे आम सा ...........

अमीरां को बोझ जो हर रोज ही ढोवे ,
बेही मजदूर खाली पेट ही सोवे !
एड़ी स्यूं चोटी पसीनू बहे ,
सियालो उन्हालो बिना कापड़ा सहे !
पीढयां बीती करयो कोनी , विश्राम सा ........ (१)
धूम धाम सा ...............

मोचीजी आज उभाणा फिरे ,
बुनकरजी ठारी मांय ठिठुरे !
कुम्हार बाबो बरते हांडी जोजरी ,
किसाना ने कोनी भर पेट बाजरी !
आम खावे सेठजी , गुठल्यां रा दाम सा ........ (२)
धूम धाम सा ...............

दीनजी रा टाबर घणां सांतरा ,
सगपण हुवण रा पड़े आंतरा !
धनजी रा टींगर गुंगा बावला ,
पण बे तो बींद बण्या घणा तावला !
मिनखा रो नहीं मोल , परणीज्ये दाम सा ........ (३)
धूम धाम सा ...............

मिसटोलां मं गरीबां का नाम ही कोनी ,
नाम वाला करे कोई काम ही कोनी !
मेट बणबा ने मल्ला अड़थड़े ,
रोज पटवार घर मं मेफिलां जुड़े !
सरपंचां का टापरा ,(अब) बण्या गोदाम सा .............. (४)
धूम धाम सा ...............

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झिणु बायरो चाहे बाजणु


झिणु बायरो चाहे बाजणु , बढ़े बतूल्या उठे आज
कोई बतावो मने  डावड़ा ,कठे गयो म्हारो सोराज .
बंगलां में दूध जबरदस्ती , कुत्तां ने प्याला भर पावे ;
झुपड़ियाँ में नाना टाबर , दाणा दाणा ने तरसावे ;
ठाला बुला करे गुलगुला , खाटणियां ने कोनी नाज (१)
कोई बतावो मने  डावड़ा...................
ऊपर से निचे तक आपां हां , पण अजे आजादी कोरी हैं ;
हर गांवेटी यूँ लागे ज्यूं , प्रेम चन्द रो होरी हैं ;
बीस बरस स्यूं करूं नोकरी ,बोहरा रो नहीं टूटे ब्याज (२)
कोई बतावो मने  डावड़ा...................
रातों रात बढ़ ज्यावे भत्ता , बे फिरे मारुती कारा में ;
अंग्रेजां को सो आवे ढ़ालो , मन बांके उणियारा में ;
कुर्सी ऱी है खीचाताणि , देश रा नेता दगाबाज (३)
कोई बतावो मने  डावड़ा...................
प्रजा पांचाली रो दुःख दूणू , घणी दाव पै उरी है ;
दुष्ट दुर्योधन और दुशासन , खाकी वर्दी धारि है ;
किणरे आगे जायर कूकां , लाज रुखाला लुटे लाज (४)
कोई बतावो मने  डावड़ा...................

 

जीवन को हे सार जवानी


मुल्क में रापट रोळ मची है , हुज्ये  डावांडोल मती तू .
जीवन को है सार जवानी , रामत में रिगदोल मती  तूं .

ज्यूं ज्यूं पगल्या मेल्हे पैड़ी , मंजिल आती जासी नेड़ी ; 
अरे आलस ने छोड़ कुपेड़ी ,ज्ये तूं चढ़नु चावे  मेडी ;
बीत्यो बगत नि आवे पाछो , करज्ये टालमटोल मती तूं (१)
जीवन को है सार जवानी .........
गांव गांव में फिरे गुरावा , बांठबांठ बेठी हे बांडी ;
ऊँचे ओदां ऊपर अजगर , नागां हाट चोवठे मांडी ;
फण किचरदे जुल्मी जेरयाँ रा , पीणा ने  पंपोल मती तूं (२)
जीवन को है सार जवानी .............
  दुबलां कानी कोई न देखे , गीत लूटेरा का स्ह गावे ;
मोलो  लागे मने मानखो , छन्दां में जद बात छुपावे ;
क्यूं कर काम्पे कलम कवि की , लून्ठा सामी लोल मती तूं (३)
  जीवन को  है सार जवानी ..............
सगळा दिन ना हुवे सरीखा , बगत किणी रो मीत न बेरी ;
च्यार  दिना की चांदनी पाछे , आणी छेकड़ रात अंधारी ;
कद कर ज्यावे  काल कलेवो , करज्ये कोरा कोल मती तूं (४)
जीवन को है सार जवानी ................
कुमानस नित का करे क्यूं , करगिल मांय कोरी कुचमादी ;
शीश सटे ही  माने सस्ती , आण जिणारी है आजादी ;
भारत  रे भोम्या रे सागे ,खल नाहक ही खोळ मती तूं (५)
जीवन को है सार जवानी ..............
चुगली चाला करे मोकला , भूल भरम में भटक्या जावे  ;
बिना बात ही गेले बेतां  , क्यूं किंके कालूंस लगावे ;
घर में बात गोडा पर घड़कर , दोष दूजां पर ढोल मती तूं (६)
जीवन को है  सार जवानी ..............

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