बुधवार, 15 जून 2011

एस. के. पाण्डेय की लघुकथा - बदलाव

“लड़कियाँ ही क्यों शादी के बाद बिदा होकर आती हैं ? आखिर लड़के क्यों नहीं बिदा होते” ? रामू मोहन से बहस कर रहा था। मोहन बोला “ ऐसा ही नियम है। सदा से ही ऐसा ही होता आया है। और आगे भी ऐसा ही होता रहेगा”।

रामू बोला “यह कोई अटल नियम नहीं है। यह एक प्रथा है। रिवाज है। और मैं सोचता हूँ कि इसमें काफी हद तक बदलाव लाया जा सकता है। जरूरत है तो बस सोच बदलने की और एक नई शुरुआत करने की। कोई एक आगे तो आये। जरूर इस दिशा में प्रगति होगी”।

मोहन बोला “ भाषण देना आसान होता है। लेकिन कर दिखाना कठिन होता है। सच ही कहा गया है कि ‘पर उपदेश कुसल बहुतेरे’। कम से कम तूने ऐसा सोचा है। तो तूँ ही ऐसा करके दिखा दे तो जानूँ। एक मिसाल बना दे”।

रामू बोला “ तूँ क्या सोचता है कि केवल मैं बक रहा हूँ। सबसे पहले मैं ही वर्षों से चली आ रही इस प्रथा को तोड़कर समाज में बदलाव लाऊँगा। मैं आज यह कसम लेता हूँ कि मैं शादी तभी करूँगा। जब मेरी यह शर्त मान ली जायेगी। मैं अपनी शादी में बिदा होकर समाज में सदियों से चली आ रही इस प्रथा में एक नए बदलाव की नीव डालूँगा।।

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ. प्र.)।

http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/

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  1. आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    चर्चा मंच{16-6-2011}

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