अजय कुमार तिवारी की कविता - हम जीतेंगे

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हम जीतेंगे
मैने  देखा  आसमान में  खिचड़ी बँटते ,
हरिश्चंद्र के  चेलों को  वादों से  नटते ।

गाली बकते हैं जिसको  पानी पी पीकर ,
उसके एक इशारे पर  रातों को  खटते ।

सबकी क्या है मजबूरी  कैसे ये  कहूँ मैं ,
त्यागी के सपने कुचलें ? कैसे ये सहूँ मैं ।

फिर भी गर मुँह खोला तो सूरज चमकेगा ,
दहलाएगा  मुझको  जलाकर वो चहकेगा ।

रोज नए - नए  फंदे  फेंके    जाएँगे ,
तारे  सब चुगली  करते पकड़े  जाएँगे ।

नदियों को देखा समुद्र की ओर ही बहते ,
पेड़-पहाड़ हैं  आसमान से  बातें  करते ।

जहाँ प्रशासन प्रकृति , कहाँ है साथ हमारे ,
चोर  उचक्के हरदम   जीते हम  हैं हारे ।

अपनी भी हठ है कि आज   भले  रीतेंगे ,
अन्ना और हम साथ साथ हैं, हम जीतेंगे ।

अजय कुमार तिवारी,
बी-14,डी.ए.व्ही.कालोनी,
जरही,भटगाँव,जिला-सरगुजा,
छत्तीसगढ़, 497235

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3 टिप्पणियाँ "अजय कुमार तिवारी की कविता - हम जीतेंगे"

  1. अन्ना के बिना भी अच्छी कविता है

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  2. बहुत सुन्दर सार्थक अभिव्यक्ति| धन्यवाद|

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