नमन दत्त की ग़ज़ल

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ग़ज़ल =
दुनिया है बाज़ार, सुन बाबा.
     हर नज़र करे व्यापार, सुन बाबा.

बेमानी है एहसासों की बात यहाँ,
     ख़ुदग़र्ज़ी है प्यार, सुन बाबा.

मेला चार दिनों का है, सब छोड़ यहीं,
     जाना है उस पार, सुन बाबा.

तेरी चादर तेरी लाज बचा पाए,
     उतने पाँव पसार, सुन बाबा.

कैसे रिश्ते नाते ? क्या मेरा तेरा ?
     मतलब का संसार, सुन बाबा.

कुछ पाने को, क्या कुछ खो डाला तूने,
     अब तो सोच विचार, सुन बाबा.

ख़ाली हाथ चले जाना है दुनिया से,
     बस इतना है सार, सुन बाबा.

हर इक गरेबाँ तर है लहू से, देखो तो-
     ये कैसा त्यौहार, सुन बाबा.

मस्जिद में हों राम, ख़ुदा मंदिर पाऊँ,
     ऐसा मंतर मार, सुन बाबा.

इंसानियत जो ज़हनों में भर दे "साबिर"
     हुनर वही दरकार, सुन बाबा.

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-- डॉ. नमन दत्त, खैरागढ़.

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1 टिप्पणी "नमन दत्त की ग़ज़ल"

  1. कैसे रिश्ते नाते ? क्या मेरा क्या तेरा?
    मतलब का संसार ,सुन बाबा। ख़ूबसुरत शे"र्,बेहतरीन ग़ज़ल

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