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हरदीप कौर सन्धु की कविता - "चिड़िया - कबूतर पकड़ना"



बचपन में
नन्हों की
नन्हीं नन्हीं सी बातें
टोकरी ले
छोटी सी छड़ी से
थोड़ा टेड़ा करते
छड़ी को
एक लम्बी रस्सी बाँधते
टोकरी के नीचे
रोटी का चूरा
मुट्ठी भर दाने
थोड़ा सा पानी रखते
‌फिर किसी कोने में
चुपके से जा छुपते
शोर मत करना
साथियों को कहते
पक्षी उड़ते उड़ते
देख कर रोटी
दाने..... पानी
बिन टोकरी देखे
जैसे ही करीब आते
अपनी समझ में
हम फुर्ती दिखाते
धीरे से...
रस्सी खींचते
टोकरी गिरते
पक्षी उड़ते....
चिड़िया फुर्र....र..र
कबूतर फुर्र....र..र
पक्षी फु्र्र  कर जाते
हाथ मलते हम रह जाते
बिन साहस हारे
दोस्तों के सहारे
फिर टोकरी रखते
कभी- न- कभी
कोई- न- कोई
कबूतर - चिड़िया
पकड़ी जाती
पंखों को कर 
 हरा गुलाबी
छोड़ देते
खुले आकाश में
लगा कर अपने-अपने
नाम की परची
ये मेरी चिड़िया.....
वो तेरा कबूतर.....

डॉ. हरदीप कौर सन्धु (सिडनी - आस्ट्रेलिया
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:) :) सुन्दर अभिव्यक्ति

बचपन की यादें ताजी कर दी हैं आपने.........

पक्षी उड़ते....
चिड़िया फुर्र....र..र
कबूतर फुर्र....र..र
पक्षी फु्र्र कर जाते
हाथ मलते हम रह जाते
बिन साहस हारे
दोस्तों के सहारे
फिर टोकरी रखते
कभी- न- कभी
कोई- न- कोई
कबूतर - चिड़िया
पकड़ी जाती

बाल कथा के प्रतीक से कही गए एक गंभीर कहानी जो सोचने पर मजबूर करती है.

बाल-सुलभ चेष्टाओं का सरस और सहज चित्रण मन को मोह लेता है। डॉ हरदीप सन्धु की कविताएं आम आदमी के सामान्य जीवन की चित्रात्मक अनुभूतियों को स्वर प्रदान करती हैं।

बेहतरीन ख़यालात , बेहतरीन अभिव्यक्ति, बधाई।

balman ka sunder chitran

सुंदर बाल कथा लगती पर गंभीर इशारे करती है
घोसले में एक चिरैया, एक कमरे में रहती है
दोनो के पंखों में देखो नाम की पर्ची बंधती है।

मेरे साथ बचपन के दिनों में लौटने के लिए
आप सबका बहुत - बहुत आभार !
हरदीप

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...

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