रविवार, 26 जून 2011

हरदीप कौर सन्धु की कविता - "चिड़िया - कबूतर पकड़ना"



बचपन में
नन्हों की
नन्हीं नन्हीं सी बातें
टोकरी ले
छोटी सी छड़ी से
थोड़ा टेड़ा करते
छड़ी को
एक लम्बी रस्सी बाँधते
टोकरी के नीचे
रोटी का चूरा
मुट्ठी भर दाने
थोड़ा सा पानी रखते
‌फिर किसी कोने में
चुपके से जा छुपते
शोर मत करना
साथियों को कहते
पक्षी उड़ते उड़ते
देख कर रोटी
दाने..... पानी
बिन टोकरी देखे
जैसे ही करीब आते
अपनी समझ में
हम फुर्ती दिखाते
धीरे से...
रस्सी खींचते
टोकरी गिरते
पक्षी उड़ते....
चिड़िया फुर्र....र..र
कबूतर फुर्र....र..र
पक्षी फु्र्र  कर जाते
हाथ मलते हम रह जाते
बिन साहस हारे
दोस्तों के सहारे
फिर टोकरी रखते
कभी- न- कभी
कोई- न- कोई
कबूतर - चिड़िया
पकड़ी जाती
पंखों को कर 
 हरा गुलाबी
छोड़ देते
खुले आकाश में
लगा कर अपने-अपने
नाम की परची
ये मेरी चिड़िया.....
वो तेरा कबूतर.....

डॉ. हरदीप कौर सन्धु (सिडनी - आस्ट्रेलिया

9 blogger-facebook:

  1. बचपन की यादें ताजी कर दी हैं आपने.........

    उत्तर देंहटाएं
  2. पक्षी उड़ते....
    चिड़िया फुर्र....र..र
    कबूतर फुर्र....र..र
    पक्षी फु्र्र कर जाते
    हाथ मलते हम रह जाते
    बिन साहस हारे
    दोस्तों के सहारे
    फिर टोकरी रखते
    कभी- न- कभी
    कोई- न- कोई
    कबूतर - चिड़िया
    पकड़ी जाती

    बाल कथा के प्रतीक से कही गए एक गंभीर कहानी जो सोचने पर मजबूर करती है.

    उत्तर देंहटाएं
  3. बाल-सुलभ चेष्टाओं का सरस और सहज चित्रण मन को मोह लेता है। डॉ हरदीप सन्धु की कविताएं आम आदमी के सामान्य जीवन की चित्रात्मक अनुभूतियों को स्वर प्रदान करती हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बेहतरीन ख़यालात , बेहतरीन अभिव्यक्ति, बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  5. सुंदर बाल कथा लगती पर गंभीर इशारे करती है
    घोसले में एक चिरैया, एक कमरे में रहती है
    दोनो के पंखों में देखो नाम की पर्ची बंधती है।

    उत्तर देंहटाएं
  6. मेरे साथ बचपन के दिनों में लौटने के लिए
    आप सबका बहुत - बहुत आभार !
    हरदीप

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------