सोमवार, 6 जून 2011

सतीश चन्द्र श्रीवास्तव की कविताएँ - लड़की ने जब जब ख्‍़वाबों के ऊन बुने, गर्माहट औरों ने ले ली...

 

1

लड़की ने जब जब सोचा

अपने बारे में

कोई और ही आ बैठा

मन के गलियारे में

लड़की ने जब जब रोटी सेंकी

और किसी की थाली में दे दी।

लड़की ने जब जब हँसी बटोरी

और किसी के होठों ने ले ली।

लड़की ने जब जब ख्‍़वाबों के ऊन बुने,

गर्माहट औरों ने ले ली।

लड़की की किस्‍मत में शायद

सम्‍बन्‍धों की तपन लिखी

खुश होते होते लड़की मुझको

आज उदास दिखी।

 

2

बम के धमाके से जैसे टूटता है पत्‍थर

वैसे ही टूट रहा है मेरा मन

आख़िर क्‍यों चाहा तुमने ऐसा

कि अनजाने ही जो बिन्‍दिया

लगा दी थी तुम्‍हारे माथे पर

क्‍या तुम यही चाहती हो

कि लगा दॅूं उसे

किसी और के माथे पर

मेरे टूटने और उसके दर्द का भी

एक इतिहास है।

अपनी आराधना के लिए

तुम मुझे मूर्ति बना कर

ज़िन्‍दगी के चौराहे पर

खड़ा कर चली गयीं

तुमने शायद यही सोचा था

कि लोग पूजेंगे मुझे देवता की तरह

लोग आते हैं और बड़े बड़े नारे

अपनी लम्‍बी लम्‍बी मांगों की फे़हरिस्‍त

चिपका कर चल देते हैं।

नारे बाजी के बीच

तत्‍व और सत्‍य की मीमांसा करते लोग,

किसी नाटक के पात्र से लगते है

बताओ, तुम्‍ही बताओ

वह मूर्ति क्‍या बन सकती है

उन नाटकों की पात्र।

 

3

आग नहीं हूं मैं

जिसे तुम दूर से देखोगे

और पहचान लोगे।

सूर्य का प्रकाश भी नहीं हॅूं मैं

जिसके स्‍वागत के लिए

तुम्‍हें खड़ा रहना पड़े।

मैं सिर्फ सच्‍चाई की तपन हॅूं

छू कर मुझे पहचानो

बारूद का विस्‍फोट नहीं हूँ मैं

जिसे सुन कर चौंकना पड़े तुम्‍हें।

मौन की व्‍यथा हूं मैं

ख़ामोशी से सुनो मुझे।

पहाड़ से गिरता

जल प्रपात भी नहीं हूँ मैं

जिसे देखोगे और खुश हो लोगे।

सिर्फ छोटी सी बावली हूं मैं

मेरे दिल में उतर कर मुझे पहचानो।

 

--

सम्प्रति :- मण्डल रेल प्रबन्धक कार्यालय, इलाहाबाद

सतीश चन्द्र श्रीवास्तव

५/२ए रामानन्द नगर

अल्लापुर, इलाहाबाद

2 blogger-facebook:

  1. लड़की ने जब जब सोचा

    अपने बारे में

    कोई और ही आ बैठा

    मन के गलियारे में
    achhi abhivyakti hai.gahan chintan.

    उत्तर देंहटाएं

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