सोमवार, 13 जून 2011

उपन्यास समीक्षा - चांदी की हंसुली

 

चांदी की हंसुली आम आदमी की जीवन्‍त कथा

 

श्री नन्‍दलाल भारती, उच्‍चशिक्षित एवं सजग साहित्‍यकार हैं।  जिसका उदाहरण है उपन्‍यास ‘चाँदी की हँसुली'। दरअसल यह उपन्‍यास हाशिये के आदमी की जीवन्‍त कथा है। उपन्‍यास चांदी की हँसुली की कथा के तीन पक्ष हैं - पहले में गरीब खेतिहर मजदूर गुदरीराम एवं उसकी पत्‍नी मंगरी है । दूसरे में मुख्‍यतः प्रेमनाथ और पत्‍नी सोनरी का  प्रेमालाप है तो उनका जीवन संघर्ष भी है । तीसरे में नई पीढ़ी के राजू-रूपमती हैं । कथा के केन्‍द्र में चाँदी की हँसुली है,जो स्‍त्री द्वारा गले में पहनी जाती है। यह केवल चाँदी की हँसुली की कथा नहीं है, यह औरतों के आभूषण-प्रेम की कहानी भी है । गहनें औरत की बड़ी कमजोरी है । हर औरत को चाहे गरीब हो अमीर,गहनों की चाह होती है। गहने स्‍त्री के श्रृंगार का मुख्‍य साधन हैं । लेकिन सभी की चाह कहां पूरी होती है ! गरीब के सपने कहाँ पूरे होते हैं । निर्धन स्‍त्री गहनों के लिये तरसती रह जाती है । कई बार तो उसकी चाहत उसकी मृत्‍यु के साथ ही दफन हो जाती है ।उपन्‍यास की मुख्‍य पात्र सोनरी के साथ यही हुआ । बचपन से उसे हँसुली का बड़ा शौक था, पर वह कभी चाँदी की हँसुली से आगे नहीं बढ़ सकी । वैवाहिक जीवन में, यहां तक की जिन्‍दगी के आखिर दिनों तक, असली हँसुली के लिये तरसती रह गयी । कर्ज चुकाने के लिये उसे अपनी चाँदी की हँसुली  को साहूकार को लौटा देने या गिरवी रखना पड़ा । लेखक के अनुसार गहना सौंदर्य सामग्री ही नहीं है,सामाजिक-सांस्‍कृतिक विरासत तथा आस्‍था और परम्‍परा का प्रतीक भी है ।

उपन्‍यास में जातिवाद, आर्थिक-सामाजिक विषमता-विसंगति, निर्धनता, मजूदरों की हाड़-तोड़ मेहनत तथा जमींदारों -साहूकारों द्वारा किये जा रहे शोषण का हृदयस्‍पर्शी चित्रण है । कई बार कृषक की भूमि को जमींदार धोखे से हड़प लेता है । कृषक जीवन भर तरसता रह जाता है । छोटी जाति के प्रेमनाथ का यह दर्द देखिये- ‘ हम मूलनिवासियों को स्‍वार्थ-सत्‍ता के मोह ने हाशिये पर लाकर पटक दिया है । पता नहीं हमें हमारी जमीन कभी वापस मिलेगी भी या नहीं ?' आज भी स्‍थिति भिन्‍न नहीं है। ऋण के बोझ-तले दबे किसान आत्‍म हत्‍याएँ कर रहे हैं । अर्थाभाव के कारण खेतिहर श्रमिक को किन-किन कठिनाइयों से गुजरना पड़ता है, उसका सटीक विवरण उपन्‍यास में हैं ।  महिला सशक्‍तिकरण के नाम पर स्‍त्री में आ रहे बदलावों के प्रति भी लेखक ने चिन्‍ता जाहिर की है । देष में मौजूद भ्रष्टाचार पर भी लेखक ने प्रहार किया है ।

 

इतिहास -बोध की झलक भी उपन्‍यास मौजूद है जिसके उदाहरण कलमकार के ये वाक्‍य हैं कि जमींदारों और पूंजीपतियों ने अंग्र्रेजो की भांति लोगों में फूट डालो और राज करो की नीति को अपनाया। उसी प्रकार जैसे अ्रग्रेजों ने चालाकी से हमारे देष को हड़प लिया वैसे ही जमींदारों-साहूकारों ने शोषित-वंचित, गरीब किसानों की जमीन को हड़प लिया । गाँवों में जमीन-जायदाद को लेकर परिवारजनों के बीच विवाद और वैमनस्‍य तब भी होता था आज भी होता है परन्‍तु भाई-चारा आज गांवों जीवित है ,इसका बोध उपन्‍यास पढ़ने पर जरूर होगा। उपन्‍यास चांदी की हंसुली लोक जीवन की गाथा है।
 
चांदी की हंसुली के आवरण में लेखक ने निम्‍न वर्ग की लाचारी, बेरोजगारी, शोषण और जीवन-संघर्ष को रेखांकित करने का प्रयास किया है। यह  सर्वहारा के सपनों के टूटने-बिखरने के कारणों की तलाश की करूण कथा है। यह उपन्‍यास मानवीय एकता का आह्‌वाहन एवं संवेदनात्‍मक गहराई है । यह उपन्‍यास सामाजिक उत्‍थान की दृष्‍टि से शोध का विषय साबित होगा । आशा है यह उपन्‍यास साहित्‍य जगत में  लोकप्रिय होगा ।

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समीक्षक-सुरेश शर्मा

उपन्‍यास का नाम-चाँदी की हँसुली
लेखक-नन्‍दलाल भारती
समीक्षक-सुरेश शर्मा
प्रकाशक-मनोरमा साहित्‍य सेवा, आजाद दीप-15-एम वीणा नगर
इंदौर-452010।मध्‍य प्रदेश।
मूल्‍य- रू 225.00 पृष्‍ठ- 224

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टीप - इस उपन्यास को आप पीडीएफ ईबुक के रूप में यहाँ से डाउनलोड कर पढ़ सकते हैं बिलकुल मुफ़्त.

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