रविवार, 26 जून 2011

सुरेन्द्र अग्निहोत्री का आलेख - आपात् काल का खतरा अभी टला नहीं


(25 जून 1975 पर विशेष जब इस देश में इस काले कानून को लागू करके नागरिक अधिकारों का हनन हुआ था)

‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ (दिनकर) परन्तु सिंहासन आसानी से खाली नहीं किया गया। आपातकाल की घोषणा प्रेस की सेंसर नसबन्दी, अनुशासन की सख्तियों, पुलिस की ज्यादतियों का नंगा नाच के बीच इन्दिरा गांधी से भी अधिक उनके पुत्र संजय गांधी का अधिनायक वाद....... सारा देश चन्द मुठ्ठियों में भिंच कर टूट गया!

आपात्काल स्वाधीनता के बाद इस देश का सबसे बड़ा कुकर्म है जिसे किसी भी हालत में भूला नही जा सकता है। आपातकाल ने इस देश में अराजकता अनाचार के साथ सत्ता का दुरूपयोग के लिऐ सत्ता लोलुप व्यक्तियों को वह खतरनाक राह दिखाई है जिसके कारण आज पूरे देश में हालात हाथ से निकलते दिख रहे है। लोकतंत्र जिस पर देश गर्व करता था। उसकी शक्ति को क्षीण करने की कोशिश तब से अब तक लगातार बड़ती जा रही है। जिसके कारण देश में लोकतंत्र कब तक सुरक्षित रहेगा। यह सवाल खड़ा हो गया है? राष्ट्रकवि  दिनकर के शब्दों में -

समर शेष है नही पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ है समय लिखेगा उनका भी अपराध
आपातकाल को याद करने के पीछे मन में जुड़ी उन स्मृतियों के सहारे अनैतिक जघन्य कुकृत्य और प्रशासन की अमानवीय क्रूरता से रूबरू कराना है। एक महिला स्वतन्त्रता सेनानी को, जो विधायक समाजसेविका भी की थी, जेल में ऐसे बन्दी रखा कि उनके साथ एक तरफ एवं कोढ़िन थी और दूसरी तरफ चीखती चिल्लाती पगली, लड़की को रखा गया था, जननायक जय प्रकाश नारायण के साथ भी जेल में सरकार द्वारा कराया गया अत्याचार कम नही था उनको कुछ समय तक ऐसी काल कोठरी में रखा गया जिसके कारण उन्होंने लम्बे समय तक सूर्य की रोशनी तक नही मिली। सूर्य अस्त होने के बाद ही कोठरी से बाहर निकल पाते थे। 73 वर्ष की उम्र उनके साथ यह व्यवहार, इतना अंधेर क्या इसका न्याय कही या कभी होगा? सत्ताधीशों के चरण  चापने में अग्रतर भूमिका निभाने वाली नौकरशाही की जवाबदेही देश के प्रति और देश के संविधान के प्रति होने के बावजूद इस तरह के आचरण के बाद भी उन्हें इस कृत्य के लिए सजा न मिलने के के कारण ही यह देश अंधकार के गर्त में गिर रहा है।

जय प्रकाश नारायन ने कहा था, भ्रष्टाचार अपराध को राजनीति से अलग करने के लिए भ्रष्ट सत्ता धारियों को स्वयं त्यागपत्र दे देना चाहिए वरन सत्ता के गलियारों में चुन कर भेजने वाली जनता को उन्हें वापस बुला लेने का अधिकार होना चाहिए।
डा. धर्मवीर भारती ने ‘मुनादी’ नामक अपनी कविता में सत्ता के जन विरोधी चरित्र को कुछ इस तरह व्यक्त किया
खल्क खुदा का, मुल्क बादशाह का
हुकुम शहर कोतवाल का
हर खास ओ आम को आगाह किया जाता है
कि खबरदार रहे
और अपने-अपने किवाड़ों को अन्दर से
कुण्डी चढ़ाकर बन्द कर लें
गिरा ले खिड़कियों के परदे
और बच्चों को बाहर सड़क पर
न भेजे,
क्योंकि एक बहत्तर बरस का
बूढ़ा अपनी कॉपती कमजोर
आवाज में
सड़कों पर सच बोलता हुआ निकल
पड़ा है..............
उसे सड़क पर निकलने से रोकने के लिऐ ताकि वह 25 जून 1975 को दिल्ली के रामलीला मैदान में जनता को सम्बोधन न कर सके पटना से हवाई जहाज चला ही नही, किन्तु दूसरे दिन जे.पी. दिल्ली पहुंच गए। उन्हें सुनने के लिऐ राजधानी की जनता के अतरिक्त आसपास के गाँव-कस्बों और नगरों से किसी न किसी प्रकार लोग रामलीला मैदान में जुटे थे। केन्द्र सरकार की सब प्रकार की रूकावटों, अड़चनों और बाधाओं के बावजूद रामलीला मैदान श्रोताओं से खचाखच भरा था तब जे.पी. ने सम्पर्ण क्रान्ति का आवाहन किया और उसी रात उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया देश में आपातकाल लागू हो चुका था जो उन्नीस माह रहा, इस समय इन्दिरा सरकार के दमन चक्र ने पूरे मुल्क को थर्रा दिया। निर्लज्ज, निर्मम निरंकुश-नादिरशाही के विरूद्ध जे.पी. की रणभेरी ने जुल्मों की रातों का अन्त के साथ इन्दिरा गांधी और उनकी दमनकारी कांग्रेस का देश भर में करारी पराजय दी।

लेकिन कांग्रेस उस सबक को सीखने के बजाय एक बार फिर देश को आपातकाल के पूर्व वाले हालातो में ले जाने की कोशिश कर रही है और लाठी के बल पर लोक को रौदने का नादिरशाही रूख अख्तियार कर रही है।

रामलीला मैदान में पिछले दिनों बाबा रामदेव के आन्दोलन को कुचलने के बाद कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह द्वारा कहा गया कि यदि गांधीवादी अन्ना हजारे द्वारा कड़े लोकपाल बिल के लिये 16 अगस्त से प्रस्तावित आमरण अन्शन शुरू किया गया तो उनके साथ ही वैसा ही सुलूक होगा जैसा योग गुरू रामदेव बाबा के साथ हुआ था। सवाल यह है कि क्या कांग्रेस एक बार फिर इस देश में लोकतन्त्र का गला घोटने के लिये भारत की लोकशाही को पंगू बनाने की कोशिश कर रही है।

देश की जनता को फैसला करना होगा कि लोकशाही को बचाने के लिये लोक और सरकारी अधिनायक वाद को समाप्त करने आपातकाल के काले दिनों को याद करते हुये सोचना होगा मुद्दो पर सहमति असहमति हो सकती है लेकिन  आवाज को कुन्द करने का षडयन्त्र एक गहरी साजिश जान पड़ती है। जिसके प्रति समय रहते जागरूक होना ही होगा। वर्ना देश की आजादी के लिये शहीदों का बलिदान व्यर्थ ही चला जायेगा। दूसरी आजादी की लड़ाई के लिये तैयार रहने का वक्त है। ज्ञानेन्द्र पति के शब्दों में -
कभी आता है एक भूकम्प ऐसा भी, जैसा कि अभी
इंसानी जमीन पर
कि दशाब्दियां जमी-पथरायी हुई
तानाशाही की परतें दरकने लगती हैं
और अचानक छोटी हो आती है
बेअन्त लगने वाली तानाशाहियों की उम्र
एक बे बाद एक

-सुरेन्द्र अग्निहोत्री
राजसदन-120/132
बेलदारी लेन
लालबाग, लखनऊ

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