संजय दानी की ग़ज़ल - मत झुकाओ नीमकश आखों को और, और कुछ दिन जीने का अरमान है।

मेरी तेरी जब से कुछ पहचान है,
मुश्किलों में तब से मेरी जान है।

प्यार का इज़हार करना चाहूं पर,
डर का चाबुक सांसों का दरबान है।

इश्क़ में दरवेशी का कासा धरे,
बेसबब चलने का वरदान है।

जब से तेरै ज़ुल्फ़ों की खम देखी है,
तब से सांसत मे मेरा ईमान है।

मत झुकाओ नीमकश आखों को और,
और कुछ दिन जीने का अरमान है।

ज़िन्दगी भर ईद की ईदी तुझे,
मेरे हक़ में उम्र भार रमजान है।

सब्र की पगडदियां मेरे लिये,
तू हवस के खेल की मैदान है।

मेरे दिल के कमरे अक्सर रोते हैं,
तू वफ़ा की छत से क्यूं अन्जान है।

तेरे बिन जीना सज़ा से कम नहीं,
मरना भी दानी कहां आसान है।

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8 टिप्पणियाँ "संजय दानी की ग़ज़ल - मत झुकाओ नीमकश आखों को और, और कुछ दिन जीने का अरमान है।"

  1. बेहतरीन ग़ज़ल .हर अश -आर खूबसूरत .याद आ गईं चंद पंक्तियाँ -जब तबीयत किसी पे आती है ,मौत के दिन करीब होतें हैं .बधाई .

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  2. मत झुकाओ नीमकश आखों को और,
    और कुछ दिन जीने का अरमान है।

    ज़िन्दगी भर ईद की ईदी तुझे,
    मेरे हक़ में उम्र भार रमजान है।

    बहुत बढ़िया....

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  3. बहुत खूब..एक एक शेर उम्दा .. खास १,५,८ नंबर के शेर ...

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  4. नीमकश आंखे और जीने की चाहत-क्या बात है दानी साहब.

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  5. वीरू भाई, वीना जी , डा:नूतन जी, भारतीय नागरिक के मुखिया और विवेक जैन जी का आभार।

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  6. अनामिका जी को शुक्रिया।

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