शुक्रवार, 17 जून 2011

रामदीन की कविता - परीक्षाफल

 
 ‘‘अर्ध सत्य’’

परीक्षाफल

मनरेगा में करी मजूरी जोड़े पैसे मइया ने

माटी, गारा, ईटें सिर पर ढोये दिन भर मइया ने



तिनका-तिनका मुंह में रखकर पाया नीड़ चिरैया ने

जैसे मधु, मधमुक्खी जोड़े करी कमाई मइया ने



ललुआ की फिर फीस जमा की पैदल जाकर मइया ने

आज परीक्षाफल आने पर खुशी मनाई मइया ने


कूलर, एसी. नहीं जानते नीम तले पुरवइया में

तपते दिन में करी पढ़ाई भूखे पेट मड़इया में


दो आँसू मोती से टपके तुरत छुपाये मइया ने

मैली धोती हाथ खुरदरे फिर फैलाये मइया ने


रात-रात भर करी पढ़ाई सिकुड़न भरी रजइया में

स्वेटर भी ना मैं दे पाई दम है मेरे भइया में


चलते राही को बतलाये लाज रखी मेरे भइया ने

सुख के दिन शायद अब आयें, कटी जिंदगी लइया में


मालपुआ जब सब खाते थे, व्रत रखता था भइया

चुपके-चुपके करे मजूरी याद करे फिर मइया


माँ बेटे यों जीते जैसे तनहा बछड़ा-गइया

माता की बीमारी में वह अच्छा बना रसोइया


दूध नही था गुड़ तुलसी की चाय बनाये भइया

देत असीस खड़ी अंगना में मस्त रहो मेरे भइया


मत भूलो जग जननी को कैसी हो हाय हदैया

इस धरती का तिलक लगाओं चूमों माटी मइया

देश जाति पर तुम बलि जाओ मत चूको मेरे भइया


--
रामदीन

जे-431,

इन्द्रलोक कालोनी

कृष्णा नगर, कानपुर रोड, लखनऊ

2 blogger-facebook:

  1. मालपुआ जब सब खाते थे, व्रत रखता था भइया
    चुपके-चुपके करे मजूरी याद करे फिर मइया
    सुन्दर भाव

    उत्तर देंहटाएं

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