रविवार, 10 जुलाई 2011

प्रभुदयाल श्रीवास्तव के 3 गीत

           

 

1

क्या कर पाये तुम

तुम्हारे गमले की मिट्टी निकालकर

रेत भर दी

क्या कर पाये तुम

खुशियों के खेत में

गिट्टी भर दी

क्या कर पाये तुम?

 

सूरज निकलकर डूब भी गया

तालाब भरकर सूख भी गया

न धूप संग्रहीत की

न जल बचा पाये तुम

क्या कर पाये तुम?

 

आदमी ने आदमी को धरती दिखा दी

आक्रोश ने चिंगारी को इतनी हवा दी

इच्छायें बुझ गईं झुलसाये तुम

क्या कर पाये तुम?

 

हाथ में लेकर आते हैं लोग

उलझन के पलीते

कट गये न जाने कितने

उदघाटन के फीते

न आग बुझा पाये

न आग लगा पाये तुम

क्या कर पाये तुम?

 

                  2

थोड़ा जल दो

तुम पल भर को सागर हो लो

मैं सरिता बनकर खो जाऊं

अपनी आहों के गीत लिखूं

तेरी बाहों में खो जाऊं|

 

तुम मचलो लहराओ खेलो

चाहे आंचल मेरा छेड़ो

अर्पण है तुमको सब मेरा

आजीवन तेरी हो जाऊं|

 

बालापन से यौवन तक मैं

घाटों पाटों पर छली गई

बहुत बचाया मैंने पर

मेरी अस्मत तो चली गई

इज्ज्त का थोड़ा जल दे दो

बस दाग लजीले धो जाऊं|

 

              3

पता नहीं कहां जाना

सभी रास्ते खुले खुले हैं

गलियों में भी नहीं रुकावट

किंतु हमारे दो पैरों को

पता नहीं कहां जाना है

दसों दिशायें सूनी सूनी

क्षितिज दे रहा आभा खूनी

दूर हुई मंजिल की दूरी

रात चौगुनी और दिन दूनी

चिट्ठी पूरी लिख डाली है

न जानू गतव्य कहां है

न कोई पता ठिकाना है|

 

चौराहे पर चार रास्ते

छींक रहे हैं खून खांसते

बगुले हंस बने बैठे हैं

भर भर मुट्ठी भाग्य बांटते

फल आशा के टंगे सामने

न जानू वे किसे मिलेंगे

कैसे उनको पाना है|

 

निर्भर है सब कुछ माली पर

नाम लिखा है हर डाली पर

पता नहीं पेड़ की रोटी

कब फेके मेरी थाली पर

एकटक ऊपर देख रहा हूं

बरसों से कर रहा प्रतिग्यां

तिनका मिला न दाना है|

2 blogger-facebook:

  1. प्रभुजी,
    वैसे तो आपके तीनों ही गीत बड़े अच्छे हैं, 'थोडा जल दो ' मेरे ह्रदय को थोडा ज्यादा छु गया है...हार्दिक बधाई!!

    उत्तर देंहटाएं

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