संजय दानी की ग़ज़ल - इश्क़ से गर वास्ता हो जायेगा, मुश्किलों का सिलसिला हो जायेगा...

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इश्क़ से गर वास्ता हो जायेगा,
मुश्किलों का सिलसिला हो जायेगा।

आज बेमन ही मदद करके तो देख,
आप ही , दिल कल बड़ा हो जायेगा।

दोस्ती कर लो चराग़ों से अगर,
आंधियों का डर फ़ना हो जायेगा।

इस ख़िज़ां के बाग़ को गर रौंदे हुस्न,
मरते मरते  भी हरा हो जायेगा।

गर पियोगे औरों के पैसों में रोज़,
एक दिन तू बेवड़ा हो जायेगा।

अपनी ज़ुल्फ़ों को संभालो जानेमन,
दिल का बादल बावरा हो जायेगा।

ज़ुल्म का फ़रसा दुधारी होता है,
कल तेरे सर पे खड़ा हो जायेगा।

बस हवस की लहरों से लड़ते रहो,
सब्र का सागर रज़ा हो जायेगा।

काशी में बिकने खड़ा है दानी, जो
मुझको लेगा पारसा हो जायेगा।

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1 टिप्पणी "संजय दानी की ग़ज़ल - इश्क़ से गर वास्ता हो जायेगा, मुश्किलों का सिलसिला हो जायेगा..."

  1. आज बेमन ही मदद करके तो देख,
    आप ही , दिल कल बड़ा हो जायेगा।

    bahut achhi pantiya

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