दामोदर लाल जांगिड की नज्म

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शब्‍दों के

निस्‍सीम जगत में

जैसे कोई एक शब्‍द हो

वैसे हूँ मैं !

 

निरा अजनबी, लिए तुम्‍हारे

ना ही कोई धातु जिसकी

ना कोई पर्याय, तत्‍सम या

अपभ्रंश ।

 

किसी एक का नहीं हुआ मैं

ना ही भाषा या बोली की

थामी झोली

ना अब तक अर्थों को ढूंढा़

खुद अर्थों ने खोजा मुझको

साथ हो लिए ,

चलते मेरे पीछे पीछे

लेकिन इक परिभाषित दूरी

कायम रख कर!

 

ऐसे जैसे कोई तो हम दोनों में से एक

अस्‍पृष्‍य हो

मगर तुम्‍हारे शब्‍द कोष में

जगह नहीं हैं मेरी खातिर

तो कोई अन्‍तर ना पड़ता

क्‍योंकि तुम झुंठला ना सकते हो ये कि मैं

एक शब्‍द हूँ

और शब्‍द का होना भर ही

सत्‍य शाष्‍वत

होता आया ।

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4 टिप्पणियाँ "दामोदर लाल जांगिड की नज्म"

  1. vah keya baat hai


    आप का बलाँग मूझे पढ कर आच्चछा लगा , मैं बी एक बलाँग खोली हू
    लिकं हैhttp://sarapyar.blogspot.com/

    मै नइ हु आप सब का सपोट chheya
    joint my flower

    उत्तर देंहटाएं
  2. बेहतरीन अभिव्यक्ति , बधाई।

    उत्तर देंहटाएं

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