रविवार, 10 जुलाई 2011

देवेन्द्र पाठक 'महरूम' की ग़ज़ल - क्या खूब है लिबास.सारा तन दिखाई दे, कुछ ऐसा भी पहन जिससे मन दिखाई दे।

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सावन में      
        :-   *   -:         
क्या खूब है लिबास.सारा तन दिखाई दे।               
कुछ ऐसा भी पहन, जिससे मन दिखाई दे।।  

           
बदहाल ग्वाल- गोपियाँ, बेहाल हैं गउएँ ;                    
हर तौर उजड़ता हुआ, मधुवन दिखाई दे।।

                        
जिस भक्त को पाहन में भी भगवान दिखे हैं; 
उस भक्त के दिल में मुझे पाहन दिखाई दे।। 


हरियाते जून में भी हैं दिल्ली के गार्डन;        
मेरे गाँव मेँ सावन मेँ न सावन दिखाई दे।। 

 
मेरे गाँव के सपनोँ मेँ रोज़ आता है शहर;    
'महरूम'   शहर मेँ गाँव, घर-आँगन दिखाई दे।।

                  ॥*॥                
(आत्मपरिचय )        
देवेन्द्र कुमार पाठक(जन्मतिथि:-27/08/1956)       
ग्राम- भुड़सा(कटनी) म. प्र./एम.ए. बी. टी. सी.(हिन्दी/अध्यापन) 
2 उपन्यास, 4 कहानी संग्रह, 1गीत-नवगीत संग्रह, 1 व्यंग्य संग्रह प्रकाशित ।
Email  devendr.k_pathak@rediffmail.com               

5 blogger-facebook:

  1. @ हरियाते जून में भी हैं दिल्ली के गार्डन;
    मेरे गाँव मेँ सावन मेँ न सावन दिखाई दे।।
    पूरी रचना शानदार, पर इस लाइन ने अंतस को भिगो दिया।

    उत्तर देंहटाएं
  2. कुछ ऐसा भी पहन, जिससे मन दिखाई दे।।

    bahut sunder ghazal..

    उत्तर देंहटाएं
  3. वाह देवेन्द्र जी,
    हमें तो आपकी रचना में एक दर्पण दिखाई दे
    जिसमें समाज का कलियुगीपन दिखाई दे...

    उत्तर देंहटाएं
  4. पूरी रचना शानदार,

    उत्तर देंहटाएं
  5. ख़ूबसूरत मतला अच्छी ग़ज़ल , बधाई।

    उत्तर देंहटाएं

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