बुधवार, 6 जुलाई 2011

एस. के. पाण्डेय की लघुकथा - परीक्षा

परीक्षा

घुवरदास जी महाराज अपने शिष्य मंडली के साथ बैठे हुए भगवत चर्चा में संलग्न थे । इसी बीच अपने गृहस्थ जीवन से ऊब कर उनके शिष्यत्व की कामना से रामू आ पहुँचा और उन्हें प्रणाम करके अपनी मंशा से अवगत कराया । रघुवर दासजी ने रामू से कहा “मेरा शिष्यत्व प्राप्त करने के लिए हर किसी को परीक्षा देना पड़ता है । जो परीक्षा में खरा उतरता है । उसी को मैं मंत्र दान करता हूँ । यहाँ जितने लोग बैठे हुए हैं । सब के सब मेरी परीक्षा में खरे उतरे हैं । आपको भी ऐसा ही करना पड़ेगा” ।

रामू बोला “ महात्मन, मुझे जो भी आज्ञा होगी । मैं उसे अवश्यमेव पूरा करूँगा” ।

रघुवरदासजी बोले “ तुम एक गृहस्थ हो । अतः तुमको अपने घर-परिवार में रहकर अपने उत्तरदायित्वों का पालन करते हुए एक छोटा सा काम करना है । यदि तुम यह कर ले जाओ । समझो परीक्षा में उत्तीर्ण हो गए । और यदि उतीर्ण हो जाना तो निसंकोच मेरे पास चले आना । मैं तुमको अवश्य ही मंत्र दान करूँगा” ।

रामू बोला “आज्ञा कीजिए महाराज । दुनिया में कुछ भी असम्भव नहीं है” ।

रघुवर दास जी ने कहा “ तुम्हें पूरे एक महीने तक अपनी पत्नी को खुश रखना है । उसे किसी भी तरह की कोई भी शिकायत तुमसे नहीं होनी चाहिए । यदि किसी भी दिन वह तुमसे किसी भी बात पर जरा सा भी रुष्ट हो गई तो तुम परीक्षा में अनुत्तीर्ण माने जाओगे । अब जाओ ! लेकिन ध्यान रहे कि इस परीक्षा में तुम परीक्षार्थी और परीक्षक दोनों हो” ।

रघुवर दासजी रामू की प्रतीक्षा करते रहे । लेकिन वह वापस नहीं लौटा ।

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डॉ एस के पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.) ।

http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/

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