शनिवार, 23 जुलाई 2011

मालिनी गौतम की कविता - खामोशी के पीछे

यूँ तो कितना कुछ

दफन हो जाता है मुझ में,

एक अँधेरा गहरा कुआँ

अनगिनत लाशों से भरा,

बस, कभी-कभार

बाहर निकलती हैं

चंद मुस्काने...

 

चंद अल्फाज़..

इक खोखली सी हँसी

फिर घंटो तक फैली

गमगीन खामोशी......

 

सब कुछ कितनी

आसानी से छुप जाता है

मेरे धीर-गंभीर,शांत, कठोर

और अभेद्य आवरण में,

कोई नहीं देख पाता

मेरे यायावर मन को

जो सदियों से भटक रहा है

एक अनजानी तलाश में...

 

मेरे अंदर हिलोरे लेते

समन्दर पर

मैं बड़ी सहजता से

बाँध देती हूँ

विचारों का इस्पाती पुल

जिसे पार कर

एक भी बूँद पहुँच नहीं पाती

पलकों के किनारों तक..

 

सब्जी काटते समय

मेरे अँगूठे पर पड़े

चाकू के निशान तो

देख लेते हैं सभी

पर मेरे अंतस पर पड़े

गहरे घावों को

मैं छुपा लेती हूँ

सुरमई काजल और

किनखाब की कश्मीरी साड़ियों में,

सब कुछ चलता रहता है

सरल,सपाट,यंत्रवत..

 

पर जब कभी उठते हैं

ज्वार-भाटे

कुछ बूँदें बना ही लेती हैं

रास्ता बाहर निकलने का

दाँत भींचकर मैं

रोक लेती हूँ

इस प्रवाह को

मन होता है

जोर-जोर से चीखूँ...चिल्लाऊँ...रोऊँ...

 

मेरे अन्दर धधकते लावा को

बाहर उँडेल दूँ

पर मैं तो ज्वालामुखी के

मुहाने पर बैठी

कर रही हूँ इंतजार

एक विस्फोट का

जिस दिन ज्वालामुखी फटेगा

मैं चिथड़े-चिथड़े होकर

बिखर जाऊँगी

हवा में फैल जाएँगी

चंद मुस्काने...

चंद अल्फाज़..

इक खोखली सी हँसी

और फिर वही घंटो तक फैली

गमगीन खामोशी.....

------

डॉ. मालिनी गौतम

7 blogger-facebook:

  1. शायद कुछ सुलग रहा है, दहक रहा है आपके अंतस में,पर वह क्‍या है यही जानने के प्रयास में रची गयी है यह कविता। बढि़या रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  2. एक आवरण के नीचे कुछ सुलगता हुआ ......

    उसकी आंच और धुएं की घुटन के भीतर कुछ बहता हुआ .....

    उस बहाव में दफ़न .........

    पूरा एक सागर ......

    क्या कहें इसे ..

    नारी की महानता या नियति ?

    पर ...

    मैं इसे कोई नाम नहीं दूंगा...

    क्योंकि मैं अनुभव करना चाहता हूँ

    खारे पानी की बूंदों की तरलता

    और

    विवशता.

    उत्तर देंहटाएं
  3. maun hoon padh kar

    kuchh kehne ko ji nahi chahta

    bas fir se ek baar padhna chahti hoon
    tab tak padhna chahti hoon jab tak ispati pul tod kar boondein sailab na jayein

    abhar

    Naaz

    उत्तर देंहटाएं
  4. मकर संक्रांति की हार्दिक शुभ कामनाएँ।
    ----------------------------
    कल 16/01/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  5. पर मेरे अंतस पर पड़े

    गहरे घावों को

    मैं छुपा लेती हूँ

    सुरमई काजल और

    किनखाब की कश्मीरी साड़ियों में,


    मालिनी जी ,
    आपने नारी के ह्रदय में छुपे ज्वालामुखी की झलक दिखला दी है ..बहुत सुन्दर प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  6. वाह...
    कमाल की रचना मालिनी जी..
    बहुत सुन्दर.

    उत्तर देंहटाएं

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