मंगलवार, 12 जुलाई 2011

अजय कुमार तिवारी की कविता - माँ

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माँ

चली गई ,

अपने पार्थिव देह के साथ ,

सौभाग्‍यवती बनकर ।

 

श्रृंगार बनाव खूब हुआ ,

उसका ,

अंतिम यात्रा में ,

जितना जीते जी कभी नहीं हुआ ।

 

मैं नहीं जानता ,

क्‍या गया मेरा ।

 

दूध का गिलास ,

आँसू पोंछने का रुमाल ,

बड़े भाइयों की मार से बचाव का कवच ,

जागते सोते मुँह में पड़ने वाली ,

दूध की खखोरन ,

घर को थाम रखने वाला बलिंडा या स्‍तंभ ,

पिता की ठौर ,

या उनके कोप के शमन का जल ,

छायादार पेड़ ,

जिसकी छांव में ठंडक पाता ,

घर का पूरा परिवार

पता नहीं क्‍या गया ?

 

बस इतना जानता हूँ ,

कि उसी दिन मेरा घर मर गया ।

और मुझे दस बरस में ही ,

समझदार बनना पड़ा ।

---

  ajay kumar tiwari

अजय कुमार तिवारी,

बी-14,डी.ए.व्‍ही.कालोनी,

जरही, भटगाँव, जिला-सरगुजा,

छत्‍तीसगढ़, 497235

--

 

(चित्र - अमृतलाल वेगड़ के कोलाज का एक अंश)

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