अजय कुमार तिवारी की कविता - माँ

image

माँ

चली गई ,

अपने पार्थिव देह के साथ ,

सौभाग्‍यवती बनकर ।

 

श्रृंगार बनाव खूब हुआ ,

उसका ,

अंतिम यात्रा में ,

जितना जीते जी कभी नहीं हुआ ।

 

मैं नहीं जानता ,

क्‍या गया मेरा ।

 

दूध का गिलास ,

आँसू पोंछने का रुमाल ,

बड़े भाइयों की मार से बचाव का कवच ,

जागते सोते मुँह में पड़ने वाली ,

दूध की खखोरन ,

घर को थाम रखने वाला बलिंडा या स्‍तंभ ,

पिता की ठौर ,

या उनके कोप के शमन का जल ,

छायादार पेड़ ,

जिसकी छांव में ठंडक पाता ,

घर का पूरा परिवार

पता नहीं क्‍या गया ?

 

बस इतना जानता हूँ ,

कि उसी दिन मेरा घर मर गया ।

और मुझे दस बरस में ही ,

समझदार बनना पड़ा ।

---

  ajay kumar tiwari

अजय कुमार तिवारी,

बी-14,डी.ए.व्‍ही.कालोनी,

जरही, भटगाँव, जिला-सरगुजा,

छत्‍तीसगढ़, 497235

--

 

(चित्र - अमृतलाल वेगड़ के कोलाज का एक अंश)

-----------

-----------

3 टिप्पणियाँ "अजय कुमार तिवारी की कविता - माँ"

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.