निसार अहमद बैंस ‘अनजान’ बीकानेरी की दो ग़ज़लें

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निसार अहमद बैंस ‘अनजान’ बीकानेरी

जन्म : 4मई 1953       निधन : 27जून 2011 

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प्रस्तुत है , पांच हज़ार से अधिक गज़लें लिखने वाले बीकानेर राजस्थान के गज़लकार की दो  रचनाएं.

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ग़ज़ल १

जो मुहब्बत से आश्’ना होगा

दोस्तों ! वो न फ़िर फ़ना होगा

 

मिस्ल शम्मा के जो जला होगा

तीरगी से वो ही लड़ा होगा

 

कर भला तेरा भी भला होगा

किसलिए तेरा फ़िर बुरा होगा

 

हुस्न जब आपका ढला होगा

कितना हैरान आईना होगा

 

दरमयां  पर्दा-ए-हया होगा

शौक़े-दीदार फ़िर सिवा होगा

 

इश्क़ उस वक़्त कीमिया होगा

दर्दे-दिल जब भी लादवा होगा

 

रिंद है , पारसा लगा होगा

कोई अनजान से मिला होगा

 

( साभार : हादसाते-हयात )

-निसार अहमद बैंस ‘अनजान’ बीकानेरी

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ग़ज़ल २

चीख  तो  चीख  है  सदा  तो नहीं

माना बहरे नहीं , सुना तो नहीं

 

जो तेरे दर पे सर को फोड़े है 

देखले तेरा आश्’ना तो नहीं

 

जब हिकायते-दर्द उसने सुनी

उसके चेहरे का रंग उड़ा  तो नहीं

 

मिस्ले-मंसूर बाद में मेरे 

दार पर दूसरा चढ़ा  तो नहीं

 

ज्यों का त्यों लौट आया ख़त मेरा 

शुक्र है उसने ये पढ़ा तो नहीं

 

सहमा कोने में कौन बैठा है

देखलो , वो कहीं ख़ुदा तो नहीं

 

बूंदा-बूंदी है आज सहरा में 

आबलों से धुआं उठा तो नहीं

 

न सही रू’नुमां निगाहों में 

नक़्श जो दिल में है मिटा तो नहीं

 

जाने क्यों मेरा नाम लेते नहीं

इतना अन्जान मैं बुरा तो नहीं

 

( साभार : हादसाते-हयात )

-निसार अहमद बैंस ‘अनजान’ बीकानेरी

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प्रेषक : राजेन्द्र स्वर्णकार

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