मंगलवार, 26 जुलाई 2011

महेन्‍द्र प्रताप पाण्‍डेय ‘‘नन्‍द'' की दो कविताएँ

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डॉ0 महेन्‍द्र प्रताप पाण्‍डेय ‘‘नन्‍द''

मॉ

मॉ तुम कितनी भोली हो, मॉ तुम कितनी भोली हो।

तुम ही मेरी पूजा अर्चन, तुम ललाट की रोली हो॥

मॉ तुम ...........

 

तुम्‍ही धरा सी धारण करके, मुझको हरदम ही है पाला,

भूख सहा है हरदम तुमने, पर मुझको है दिया नेवाला,

नही कदम जब मेरे चलते, ऊंगली पकड़ संग हो ली हो॥

मॉ तुम .............

 

धीरे - धीरे स्‍नेह से तेरे, मैने चलना थोड़ा सीखा,

पर आहट जब मिली कहीं कि, लाल हमारा थोड़ा चीखा,

दौड़ पड़ी नंगे पद हे मॉ, करूण स्‍वरों में तुम बोली हो॥

मॉ तुम ..............

 

बिना तुम्‍हारे सारा जीवन, लगता माते है यह रीता,

जब तक है आशीष तुम्‍हारा, तब तक मै हूॅ जग को जीता,

तुम तो हो ममता की मूरत, सुखद स्‍नेह की झोली हो॥

मॉ तुम .............

 

अगर तुम्‍हारे ऊपर अपना, सारा जीवन अर्पित कर दूॅ,

नही मिटेगा कर्ज तुम्‍हारा, चाहे सभी समर्पित कर दूॅ,

भले कुपुत्र हुआ मै बालक, कभी नही तुम डोली हो॥

मॉ तुम .................

--

मूक करुण स्‍वर

आओ चलें क्षितिज के पार,

जहॉ न होता यह संसार।

 

शान्‍ति अवनि है नभ का प्रांगण,

शान्‍ति प्रकृति का नीरव नर्तन।

नीरवता का राज्‍य रहेगा,

नीरव अनिल अनल पय धार।

आओ चलें क्षितिज के पार,

जहॉ न होता यह संसार॥1॥

 

अनावरित हो हिय मंजूषा,

बने चकोरी चॅद्र पियूषा,

सच्‍चे होयें सपने अपने,

अमित कल्‍पना हो साकार।

आओ चलें क्षितिज के पार,

जहॉ न होता यह संसार॥2॥

 

हम तुम होंगे दोनो एक,

वहॉ न होगें विघ्‍न अनेक,

सुख के सारे साज सजेंगें,

अपना रचित नया संसार।

आओ चलें क्षितिज के पार,

जहॉ न होता यह संसार॥3॥

 

प्रणय मिलन की प्रबल पिपासा,

चिर संचित उर की अभिलाषा

क्षण में तृप्‍ति बनेगी सारी,

नीति नव प्रीति रीति व्‍यवहार।

आओ चलें क्षितिज के पार,

जहॉ न होता यह संसार॥4॥

---

 

डॉ0 महेन्‍द्र प्रताप पाण्‍डेय ‘‘नन्‍द''

राजकीय इण्‍टर कॉलेज द्वाराहाट अल्‍मोड़ा

4 blogger-facebook:

  1. आपकी रचना आज तेताला पर भी है ज़रा इधर भी नज़र घुमाइये
    http://tetalaa.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  2. दोनों ही रचनाएं बेहतरीन ...प्रस्‍तुति के लिये आभार ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. दोनों कविताये बहुत ही खूबसूरत लगी दोस्त एक एक शब्द बोलते हुए |

    उत्तर देंहटाएं

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