सोमवार, 4 जुलाई 2011

साक्षी दीक्षित की कविता - तृप्ति

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तृप्ति

श्वेत , स्वच्छ आसमान पर,
काले घनघोर बादल,
बस,
बरस पड़े धरती पर ,
उसकी प्यास बुझाने.
फिर भी कहीं बंजर धरती ,
मुंह उठाये,
गगन को ताक रही है,
ना जाने वो क्या चाहती है?
तभी,
कहीं से अचानक आयी
पहली फुहार से उठी]
उस धरती की मिट्टी की खुश्बू,
जो अभी-अभी तृप्त हुई है.

6 blogger-facebook:

  1. bahut hi khoobsurat fikr ko likha hai. thanks for sharing with us.

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  2. सुन्दर अभिव्यक्ति , बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  3. सर्वप्रथम इतनी सुंदर रचना के लिये बधाई। साक्षी जी आपकी कविता में एक खुश्बू है, गजब का भावनात्मक अहसास है। प्रकृति के कोमल प्रतीकों के माध्यम से अनेकानेक गूढ़ अर्थों को समेटने की एक शानदार कोशिश।

    फिर भी कहीं बंजर धरती ,
    मुंह उठाये,
    गगन को ताक रही है,
    ना जाने वो क्या चाहती है?


    ईश्वर आपको सफलता दे।

    उम्मीद है, जल्द ही आपकी अन्य रचनायें भी पढ़ने को मिलेंगी।



    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुवर्णा9:23 am

    बहुत बधाई साक्षी, सुन्दर रचना

    उत्तर देंहटाएं
  5. सुवर्णा9:25 am

    बहुत बधाई साक्षी. सुन्दर रचना.
    --सुवर्णा

    उत्तर देंहटाएं

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