बुधवार, 20 जुलाई 2011

अदिति मजूमदार की लघुकथा तन्वी

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तन्वी अपने कमरे के खिड़की से बाहर देख रही थी. उसे देखने से लग रहा था कि कुछ गहरी सोच में है. बाहर से एक चिड़िया बेचने वाला जा रहा था जिसे तन्वी हमेशा रोकती थी,आज उसे उसकी आवाज तक सुनाई न दिया . वह चिड़िया बेचने वाला भी हैरानी से घर की ओर ताकता हुआ आगे बढ़ रहा था. तन्वी अपने धुन में खोई हुई थी. उसने देखा ही नहीं कि चिड़िया बेचने वाला वहां से गुज़र रहा था. तन्वी क्यों और क्या सोच रही थी?


तन्वी के पिता श्री मनोहर प्रसाद ने एक दिन बाहर से घर में घुसते हुए अपनी पत्नी सुषमा से बोल रहे थे कि "सुनती हो...लगता है कि इस बार बात बन जाएगी. सिन्हा जी से बात की है." सुषमा पलट कर बोली "सच कह रहे हो ? इस बार अगर बात पक्की हो जाती है तो कुल देवी के लिए गहना बनवाऊँगी "


"बनवा लेना, बनवा लेना,  पहले कुछ बात बन तो जाये"


तन्वी के कानो में भी ये बातें गई. वह समझ गई थी उसके माता पिता उसके विवाह की बात कर रहे है. वह दरवाज़े के पास खड़ी सोच रही कि क्यों ऐसा होता है कि लड़की आज भी बोझ ही.... वह कब सामान के दर्जे के बाहर आएगी. कब उसे और अन्य लड़कियों को इन्सान समझा जायेगा.


तन्वी जानती थी कि वह एक माध्यम वर्गीय परिवार में जन्मी जहाँ देहज जुटाना मुश्किल तो है असंभव सा भी. लोगों की मांगों के आगे लड़की वालों की चलती कहाँ? माता पिता भरपूर कोशिश करते रहते है कि जो मांग किया जाये उसे पूरा करे. समाज के उसूलों के आगे झुकना ही पड़ता है.


इसलिए तन्वी आज अनमने से कुछ सोच रही थी और खिड़की से बाहर देख रही थी. वह सोच रही थी कि उसका होने वाला पति संजीव क्यों नहीं कुछ कर सकता आज कल के लड़के भी क्या इस प्रथा में शामिल होने लगे हैं?उन्हें भी क्या अच्छा लगने लगा है कि कुछ ऊपर की कमाई उनकी जेबें भर दें.


तन्वी उठ खड़ी हुई. फोन घुमाया. उस छोर से आवाज आई ."हैलो" " हैलो ""हैलो हैलो...." तन्वी किसी तरह हिम्मत जुटा कर बोली "हैलो, मैं तन्वी बोल रही हूँ" संजीव बोला "मैं संजीव बोल रहा हूँ .कैसी हो ?" "मैं ठीक हूँ. मुझे आप से कुछ कहना था."


"हाँ कहो .... यहाँ फोन पर या कहीं ओर...


तन्वी बोली "प्लीज़ आप मुझ से शादी करें मेरे पिता की बेबसी से नहीं. मेरे पिता को देहज के लिए चिंता करते देख बुरा लग रहा है" कह कर फोन रख दिया


अगले दिन शाम को मनोहर प्रसाद लगभग रास्ते से ही चिल्लाते हुए घर में कदम रखा. जानती हो सुषमा "आज सिन्हा जी ने खुद कहा कि उन्हें एक पाई देहज नहीं चाहिए. लड़की को अगर खाली हाथ भेज सकें तो भेजें. यकीन नहीं आता.... ऐसे भी लोग होते है जो गुणों की कदर करते है"

तन्वी खड़ी सुन रही थी. जल्दी से जाकर फोन घुमाया ....संजीव को जो शुक्रिया कहना था!

4 blogger-facebook:

  1. Indira5:20 pm

    really a short one with high message, gud

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  2. "दहेज" भारत की एक बड़ी विकृति| उतर भारत मैं तो दर्जनों गंभीर घटनाये इसके दुष्परिणामों के रूप में सामने आती हैं जो अखबार के पन्नों में जान डालती हैं|अदिति मजूमदार जी की यह लघु एवं सारगर्भित कहानी उन तमाम नयी लडकियों को अपने पृकृति प्रदत्त अंतर्मुखी स्वभाव से बाहर निकल कर अपनी लड़ाई स्वयं लड़ने की प्रेरणा देती है|

    Somnath Danayak
    Tech. Superintendent
    Materials Science Programme
    IIT Kanpur

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  3. Awesome!!
    kash sabhi ladke ease ehote...

    उत्तर देंहटाएं
  4. काश ऐसी सोच और विचारधारा के लड़के समाज में ज्यादा हो और समाज से दहेज़ जैसी कुप्रथा का विनाश हो सके, पर इसके लिए आजकल के पढ़े लिखे लड़कों को आरंभ करना होगा. इश्वर की कृपा से उनको शिक्षा और ज्ञान मिला है तो उसका उपयोग करें इस समाज को सही दिशा में ले जाने के लिए, तब हमारे समाज में शायद स्त्री के जीवन से इस कुप्रथा का साया हट सके.

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