संजय दानी की ग़ज़ल - क्या पता इंसानियत का दर्द मुझको, सोच से ता-उम्र सरकारी रहा हूं...

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मरने की उम्मीद में बस जी रहा हूं,
अपनी सांसों का कफ़न खुद सी रहा हूं।

तेरी आंखों के पियाले देखे जब से,
मैं शराबी तो नहीं पर पी रहा हूं।

जनता के आइनों से मैं ख़ौफ़ खाता ,
मैं सियासी चेहरों का पानी रहा हूं।

तुम तवायफ़ की गली की आंधियां, मैं,
बे-मुरव्वत शौक की बस्ती रहा हूं।

क्या पता इंसानियत का दर्द मुझको,
सोच से ता-उम्र सरकारी रहा हूं।

काम हो तो मैं गधे को बाप कहता,
दिल से इक चालाक व्यापारी रहा हूं।

इश्क़ में तेरे ,हुआ बरबाद ये दिल,
हुस्न के मंचों की कठपुतली रहा हूं।

जग, पुजारी है किनारों की हवस का,
सब्र के दरिया का मैं कश्ती रहा हूं।

मत करो दानी हवाओं की ग़ुलामी,
मैं चरागों के लिये ख़ब्ती रहा हूं।

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6 टिप्पणियाँ "संजय दानी की ग़ज़ल - क्या पता इंसानियत का दर्द मुझको, सोच से ता-उम्र सरकारी रहा हूं..."

  1. इश्क़ में तेरे ,हुआ बरबाद ये दिल,
    हुस्न के मंचों की कठपुतली रहा हूं।

    bahut he sundar

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  2. तेरी आंखों के पियाले देखे जब से,
    मैं शराबी तो नहीं पर पी रहा हूं....
    बहुत खूब दानी साहब...

    उत्तर देंहटाएं
  3. पूरी गज़ल ही लाजवाब है। दानी साहिब को बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  4. क्या पता इंसानियत का दर्द मुझको,
    सोच से ता-उम्र सरकारी रहा हूं।
    sahi kaha hai.

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  5. विद्या जी, हिमकर जी व विजय वर्मा जी का आभार।

    उत्तर देंहटाएं

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