रविवार, 17 जुलाई 2011

गरिमा जोशी पंत की दो कविताएँ

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हव्‍वा का सच

दुबक के बैठा है कोने में
मेरे मन का मौन सुआ।
कभी-कभी जो लब खोले
अनमना-सा कहता कोई दुआ।
हुआ क्‍या आखिर बीती रात?

अरे पहले भी क्‍या वो कहता था
बस टाँय-टाँय चिल्‍लाता था।
अक्‍सर तो लोग झिड़कते थे
पर  कभी-कभी जो मन आए,
मिल भी जाती थी कोई दाद।

इसी दाद की मदहोश पिनक में
कर बैठा गहरा अपराध।
आवाज़ उठाना तो ठीक था
पंख फैला बैठा नादान।
अब पिंजर-तीली से टकराकर
खाई कैसी पैनी मात।

क्‍यूँ भूल गया कि,
ऊपर से सब उजला है
समभाव दिखे सब बाहर से
पर अपने सच को टटोल
याद तो रखता कि असल में है वो हव्‍वा जात।


 

दात्री

मैं हिमगिरियों की बाला हूँ,
तू गंदे हाथों से मुझे न छू।
मैं गहरी खाई में जाऊँगी कूद,
जो केश आएँ तेरी मुट्‌ठी में
लकीरें खींच ही जाऊँगी,
तुझे खुशकिस्‍मत कर जाऊँगी।

तू पलायन कर कैसे इस रेगिस्‍तान में चला आया?
मैं मरूस्‍थलों की बंजारिन हूँ,
धोरों में कहीं खो जाऊँगी
और जो तू खोजेगा मुझको
मरीचिका दिखला के तुझे,
क्षणिक सुख तो दे ही जाऊँगी।

ये समुद्र तो मेरा अपना है,
तू हाथ खींच मुझे ले चला कहाँ?
मैं घुस जाऊँगी सीपी में
और जो तू उसको खोलेगा
मोती तुझको दे जाऊँगी।

चट्‌टानों की तो बात न कर
ओ मेरे तथाकथित सहचर,
उन्‍हें तो कबसे ले छाती पर
मैं भटक रही सम यायावर।
उनके नीचे कई राज़ तेरे
मैं दफ़न किए मर जाऊँगी।


गरिमा जोशी पंत

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About Garima Pant

A historian by profession and communicator by vocation - proficient in English and Hindi - recipient of several honors during her academic pursuit, including 80th Rank in Rajasthan Board Secondary School Examination in 1989, topped the Department of History in the M. Phil. examinations conducted by the University of Rajasthan, Jaipur, in March 2001, recipient of University Scholarship - published English Language articles in Competition Success review - writes poems and common interest articles both in English & Hindi - appeared in a Radio Program of Aakashvaani Jaipur - Education: M. Phil History, source material for the dissertations was Vedas, Upanishads, Raj Tarangani, Buddhist literature, etc. with special reference to the works of Prof. D.D. Kosambi and R.C. Mujumdar, M. A. History, B.Sc. Honors Zoology - deeply interested in Dramatics, Child Psychology and Child Development.

8 blogger-facebook:

  1. ये समुद्र तो मेरा अपना है,
    तू हाथ खींच मुझे ले चला कहाँ?
    मैं घुस जाऊँगी सीपी में
    और जो तू उसको खोलेगा
    मोती तुझको दे जाऊँगी।

    सुन्दर भावपूर्ण रचना

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुतियां ||
    बधाई ||
    सुआ राम-राम भी बोलेगा ||
    सिखाइये तो ||

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुन्दर भावपूर्ण रचना

    bahut kub

    उत्तर देंहटाएं
  4. अद्भुत हैं दोनो रचनायें,
    बहुत बहुत आभार,
    विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  5. गरिमा जी,
    आपकी दोनों ही रचनाओं में बड़े ही सुन्दर ढंग से दो अलग - अलग बातें कही हैं...सचमुच दोनों ही कवितायें अच्छी बन पड़ी हैं....

    उत्तर देंहटाएं
  6. सुन्दर भावपूर्ण रचना
    दोनों ही कवितायें अच्छी हैं....

    उत्तर देंहटाएं
  7. सुन्दर भावपूर्ण रचना
    दोनों ही कवितायें अच्छी हैं....

    उत्तर देंहटाएं

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